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ओबामा की बारी

अब भले ही हारं या जीतें, अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी जीतकर बराक ओबामा ने नया इतिहास रचा है। पांच माह के प्रचार अभियान में पार्टी की प्रतिद्वन्द्वी प्रत्याशी हिलेरी क्िलंटन के साथ उनकी खूब नोंक-झोंक व छींटाकशी हुई, पर अब यह तनाव शायद ठंडा पड़ जाए और मुमकिन है कि हिलेरी उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनना मंजूर कर ले। इस सूरत में अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। यदि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद पर क्रमश: ओबामा व हिलेरी जीतते हैं, तो वह सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण होगा, जो अमेरिकी राजनीति, सियासत और समाज की तस्वीर बदल सकता है। फिलहाल, पर्यवेक्षकों की निगाहें दो बातों पर टिकी हैं। एक, क्या हिलेरी उपराष्ट्रपति पद की दावेदार बनना चाहेंगी? दो, यदि नहीं तो क्या ओबामा रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी जॉन मैक्केन को चुनावी शिकस्त दे पाएंगे? इतना तय है कि यह चुनाव अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अश्वेत ओबामा के रूप में एक मजबूत डेमोक्रेटिक प्रत्याशी ने उस समय जोरदार दस्तक दी है, जब परंपरावादी और श्वेत-बहुल समर्थकों वाला सत्ताधारी रिपब्लिकन प्रशासन अनेक मोर्चो पर बुरी तरह विफल रहा है। इराक युद्ध हो या आतंक के खिलाफ जंग, गैसोलिन के ऊंचे दाम हों या बदहाल अर्थव्यवस्था या फिर विश्व में अमेरिका की गिरती साख-रौबदाब, बुश प्रशासन के अनेक फैसलों से वोटरों में नाराजगी कम नहीं है। इसका फायदा ओबामा को मिलने की संभावना बेबुनियाद नहीं। प्राइमरी चुनाव में हिस्पानियों का एक बड़ा वर्ग हिलेरी के साथ था तो अश्वेतों की भारी तादाद ओबामा के साथ। इस दौरान चली खींचतान को भुलाकर यदि ये दोनों बड़े समुदाय पूर उत्साह से ओबामा को समर्थन देते हैं तो उनकी जीत सुनिश्चित की जा सकती है। देखना यह है कि ओबामा यह एकाुटता पैदा कर पाते हैं या नहीं? वोटरों के सामने ओबामा ने बदलाव पर जोर दिया है, जबकि मैक्केन ने सुधारों पर। बदलाव और सुधार के जुमलों की ये गूंजें चुनाव तक जारी रहेंगी- अंतिम फैसला वोटर ही करंगे।ड्ढr ं

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