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आरक्षण : इस रात की सुबह नहीं

ओबीसी आरक्षण की राजनीति अपने ही अंतर्विरोधों में उलझती जा रही है। संविधान के निर्माताओं ने सभी लोगों को अवसर की समानता प्रदान करने तथा धर्म, जाति, वर्ण, लिंग और क्षेत्रगत आधारों पर होने वाले भेदभावों से मुक्ित दिलान के लिए संविधान में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों व शिक्षा में अस्थायी रूप से आरक्षण का प्रावधान किया था। पर ओबीसी आरक्षण संविधान निर्माताओं की सोच का हिस्सा नहीं था। बाद में मण्डल आयोग ने ओबीसी श्रेणी को निर्धारित करन के लिए 10 की जनगणना के जिन आंकड़ों को अपना आधार बनाया था, वे भारतीय संविधान निर्माण से तकरीबन 20 वर्ष पहले से ही मौजूद थे। ओबीसी आरक्षण और भारत की राजनीतिक स्थिति एक-दूसरे से बेतरह गुंथे हुए आयाम हैं। जब तक केन्द्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा, ओबीसी आरक्षण को कोई तरजीह नहीं दी गई। 1में काका काललकर आयोग की इस बाबत की गई सिफारिशों को नेहरू और फिर 10 में मण्डल आयोग की संस्तुतियों को इंदिरा सरकार ने नजरंदाज कर दिया था। जैसे ही राजनीतिक परिदृश्य पर कांग्रेस की उपस्थिति कमजोर पड़ने लगी, क्षेत्रीय ताकतें अपना जनाधार तैयार करने लगीं। केन्द्रीय राजनीति में वीपी सिंह सामाजिक समानता के पैरोकार बनकर उभरे। अपने समकक्ष राजनीतिक कद वाले नेताओं को पीछे छोड़ने और चुनावी गणित में जनता दल को बढ़त दिलान के लिए उन्होंने मण्डल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर दिया। इस तरह आरक्षण की व्यवस्था का राजनीतिकरण हो गया। ओबीसी आरक्षण की राजनीति वोट बैंक बनाने और मजबूत करन की गारंटी बन गई। परिणाम कि यादव, कुर्मी, जाट, मीणा और गुर्जर जैसी सक्षम जातियां ओबीसी आरक्षण में हिस्सेदार बनती चली गईं। इसीलिए 10 में मंडल कमीशन ने जहां 1,257 समुदायों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया था, आज यह संख्या तकरीबन 2,300 तक पहुंच चुकी है। महज 18 सालों में इसकी सूची में 60 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी। पर गुर्जर समुदाय का वर्तमान आन्दोलन ओबीसी आरक्षण की नई और चिंताजनक पेचीदगियों की ओर इशारा करता है। शायद यह पहला अवसर है जब कोई विशिष्ट जाति-समुदाय आरक्षण सम्बंधी अपनी मांग को लेकर इतने बड़े और आक्रामक स्तर पर आन्दोलनरत हुआ है। वसुंधरा सरकार के साथ गुर्जरों का संघर्ष अपनी जरूरतों और सुविधाओं के अनुरूप आरक्षण व्यवस्था में अधिक बेहतर स्थिति हासिल करन का है। वे अपने समुदाय को एसटी कोटे में शामिल करन की मांग कर रहे हैं। कहा जाता है कि भाजपा ने राजस्थान विधानसभा के चुनाव के वक्त गुर्जर समुदाय से यह वादा किया था। जबकि किसी भी समुदाय को एसटी कोटे में शामिल करना बेहद जटिल और कठिन प्रक्रिया है, जिसके लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य है। गुर्जर आन्दोलन ओबीसी आरक्षण के दोतरफा अन्तर्द्वद्व का प्रतीक है। एक ओर उनकी आपत्ति ओबीसी कोटे में जाटों को शामिल किए जाने से जुड़ी है। 1से ओबीसी कोटे में शामिल गुर्जर 1में जाटों को भी इस श्रेणी में शामिल किए जान के बाद से ही खुद को एसटी कोटे में शामिल करन की मांग करते रहे हैं। जाटों को शामिल किए जाने से मीणा समुदाय के भीतर भी भारी नाराजगी रही है। दूसरी ओर ओबीसी कोटे से एसटी कोटे में भेजे जान की मांग खुद में चिंता पैदा करती है। क्योंकि समाजशास्त्रीय विशेषज्ञों के बजाय जाति समुदाय अब खुद ही यह तय करने लगे हैं कि उनके लिए आरक्षण का सबसे मुफीद कोटा और उसका प्रतिशत क्या है। चिन्ता इस बात की भी है कि ओबीसी आरक्षण की राजनीति अब एससी-एसटी आरक्षण को भी संक्रमित करने लगी है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कहा जाए तो अब भी एससी-एसटी कोट के साथ कोई छेड़छाड़ न सिर्फ संविधान की मूल भावना बल्कि सामाजिक समानता के सपन के भी खिलाफ होगी।ड्ढr ओबीसी आरक्षण कोट की अपनी निश्चित सीमाएं हैं। उसे एक हद से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए जब ऐसे आंतरिक द्वंद्व पैदा होंगे तो यह संघर्ष सामाजिक तनावों के रूप में सामने आएगा। यह चुनावी राजनीति सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग के बीच ही नहीं, आरक्षित वर्ग के भीतर एससी-एसटी और ओबीसी और इनके भी भीतर मौजूद विभिन्न समुदायों के बीच अभूतपूर्व दूरियां और मनमुटाव पैदा करेगी। आरक्षण का जो प्रावधान सामाजिक समानता लान का माकूल तरीका था, ओबीसी कोट की राजनीति उसे सामाजिक तनावों की वजह बनाए दे रही है। आरक्षण का चुनावीकरण एक ढलान वाला रास्ता है। जिस पर एक कदम बढ़ान के बाद चार कदम अपने आप उतरना ही पड़ता है। वापस लौटना मुमकिन नहीं। तकरीबन दो दशक इसी में जाया हो गए हैं।ं

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