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अपराधियों की उम्मीदवारी पर कोर्ट ने उठाया सवाल

‘आपराधिक छवि’ के व्यक्ित को चुनाव में चुनौती देना, साफ सुथर और बेदाग चरित्र वाले व्यक्ित के मानवाधिकारों का हनन हो सकता है? एक महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कुछ ऐसी ही राय कायम की है। अदालत का मानना है कि इस मुद्दे पर विचार होना चाहिए। पीठ ने इस मुद्दे को संसद पर छोड़ते हुए कहा है कि यह सोचना कानून बनाने वालों का काम है कि उनकीोमात में कानून तोड़ने वाले शामिल हों या नहीं। अदालत ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र और समाा की भलाई इसी में है कि संसद ऐसे लोगों का प्रतिनिधित्व करोिनका चरित्र बेदाग हो औरोिनका कोई आपराधिक इतिहास न हो। संसद को उचित प्रावधान बनाने पर विचार करना चाहिए।ड्ढr न्यायमूर्ति प्रदीप कांत और न्यायमूर्ति श्रीनारायण शुक्ला की खण्डपीठ ने यह फैसला ‘ानहिताय’ नामक संस्था की ओर से दायर एकोनहित याचिका पर बुधवार को सुनाया। याचिका मेंोनप्रतिनिधि अधिनियम 1ी धारा 62 के सब क्लाा पाँच का हवाला देकर कहा गया था कि ऐसा व्यक्ितोो किसी साा के तहत ोल में बंद हो या फिर पुलिस की कैद में हो, कोोब मतदान करने का अधिकार नहीं है तो भला ऐसे लोग चुनाव कैसे लड़ सकते हैं। दलील दी गई थी कि ऐसे लोगोिन पर संगीन अपराधों के मुकदमें चल रहे हैं और वे ोल में और पुलिस की कैद में हैं,ोनप्रतिनिधि की भूमिका नहीं निभा सकते।ड्ढr याचिका में पहला तर्क यह था कि धारा 62(5) के तहत ोल में या पुलिस कैद में रहने वाले व्यक्ित का मतदान का अधिकार निम्बलित होोाता है परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ित तब तक के लिएोब तक कि वह कैद में हो, का नाम मतदाता सूची से निकाल दिया गया मानाोाना चाहिए। दूसर ऐसे व्यक्ित का नाम बनाए रखने से उस व्यक्ित के साथ ोदभाव की स्थिति बनती हैोिसको मतदान का अधिकार है।

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