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सूबे में गड़बड़ा रहा पर्यावरण

बिहार में पर्यावरण का संकट गहराता जा रहा है। यह स्थिति गंगा रूठने और पेड़ों की कटाई और बाग-बगीचों के उाड़ने के कारण पैदा हुई है। राज्य में पर्यावरण को बचाने के लिए गंगा और बचे-खुचे ताल-तलैयों को बचाना जरूरी हो गया है। राज्य में 33 प्रतिशत जंगल होना चाहिए, लेकिन राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का सिर्फ 6.87 प्रतिशत ही जंगल है। सूबे में13.80 प्रतिशत भूमि बंजर है। पूर बंजर भूमि में यदि जंगल लगा दिया तो भी इससे काम नहीं चल सकता।ड्ढr ड्ढr नदियां सूख रही हैं और कई नदियों का पानी भी गंदा हो चला है। राज्य के दक्षिण बिहार के जिलों में पीने के पानी का संकट झेलना पड़ता है। दूसरी ओर हर साल उत्तर बिहार क ो बाढ़ का संकट झेलना पड़ता है। उत्तर बिहार घने बाग-बगीचे खत्म हो गीं। पेड़ों की कटाई और नदियों के प्रदूषण का ही असर है कि मौसम का मिजाज बदल रहा है।ड्ढr बिहार में भूगर्भ जल उपयोग के मामले में वह सतही जल से ज्यादा बोझ ढो रहा है। राज्य में उपलब्ध भूगर्भ और सतही जल का सिर्फ 12 प्रतिशत ही उपयोग होता है। इस उपयोग में सिंचाई का हिस्सा लगभग प्रतिशत है। सिर्फ 7.6 प्रतिशत ही पीने के पानी के रूप में उपयोग होता है। आज पीने के लिए बिहार में कम से कम 360 करोड़ घन मीटर साफ पानी की जरूरत है। गर्मी के दिनों में दक्षिण-मध्य बिहार भूगर्भ जल का स्तर नीचे चला जाता है। जानकार मानते हैं कि नदियों को इस कदर छेड़ा गया है कि सतह का पानी सिर्फ बाढ़ लाता है और भूगर्भ पानी पेयजल की मांग को ढो रहा है। बिहार के पर्यावरण के बार में पूछे जाने पर प्रो.रास बिहारी सिंह ने बताया कि बिहार की मिट्टी और जल संसाधन प्रबंध की जरूरत है। बगीचा और घने पेड़ लगाने की जरूरत है, जो पर्यावरण को संरक्षण दें और लोगों की आमदनी का साधन भी बने।

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