DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

किसके पाले में गिरेगा बरेली का झुमका!

रूहेलखंड की राजनीति का केंद्र और रामगंगा के किनारे बसे बरेली शहर के लगभग सात लाख महिला मतदाताओं के साथ कुल 15.84 लाख मतदाता 17 अप्रैल को होने वाले मतदान में अपने सांसद का चुनाव के लिए मतदान करेंगे।

मिश्रित आबादी वाला यह शहर सांप्रदायिक लिहाज से काफी संवेदनशील माना जाता रहा है। 1989 से 2004 तक इस सीट के वाशिंदों ने लगातार छह बार भाजपा के संतोष गंगवार के सिर जीत का सेहरा बांधा, लेकिन 2009 में उन्हें कांग्रेस के प्रवीण सिंह एरन के हाथों मुंह की खानी पड़ी। इस बार गंगवार अपनी वापसी के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं।

बांस के फर्नीचर और आंखों के सुरमे के लिए मशहूर बरेली इस समय एकदम शांत है। किसी भी कोने से प्रवेश करें और लोगों की चुनावी नब्ज टटोलें तो आमतौर पर एक ही उत्तर मिलता है कि हम शहर का विकास करने वाले प्रत्याशी को वोट देंगे। प्रत्याशी का नाम बताने के लिए कोई तैयार नहीं।

सुबह-सुबह चाय की दुकान पर चुस्कियां मार रहे श्याम मोहन हों या अपनी दुकान खोल रहे रहीसुद्दीन, किसे वोट देंगे के उत्तर में केवल रहस्यमय मुस्कुराहट ही मिलती है। बरेली कालेज के निकट आइसक्रीम खाते नौजवानों में मोदी इफैक्ट दिखाई देता है लेकिन बरेली कैंट के सुभाष नगर के निवासी समीर अग्रवाल विकास करने वाले को ही समर्थन की बात करते हैं।

दरअसल, इस शहर की सांप्रदायिक संवेदनशीलता इसे काफी हद तक मौन रखे हुए है। लेकिन मन में हर मतदाता जैसे तय कर चुका है कि किसे वोट देना है।

यह सीट फिलहाल कांग्रेस के कब्जे में है तो जाहिर है उसकी ओर से प्रवीन सिंह एरन एक बार फिर मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। उन्हें एहसास है कि पिछली बार उन्होंने गंगवार को केवल 9329 वोटों से हराया था जिसमें उनकी अप्रत्यक्ष सहायता भाजपा के एक केंद्रीय नेता का आशीर्वाद प्राप्त दमदार विधायक ने भितरघात करके की थी।

इस बार कथित मोदी लहर के चलते गंगवार के हौसले बुलंद तो हैं ही, अपने चुनावी रणनीतिक कौशल के कारण वे सातवीं बार संसद में पहुंचने का समीकरण बैठा चुके हैं।

उधर, बसपा के उमेश गौतम यहां पहली बार नीला परचम फहराने की कोशिश में हैं। उन्हें बरेलवी संप्रदाय के मुस्लिम धर्मगुरु तौकीर रजा खान से बड़ा सहारा मिला है जिन्होंने अपने अनुनाइयों से खुल कर बसपा के पक्ष में मतदान कराने की अपील की है।

ध्यान रहे कि मुजफ्फरनगर दंगों में अखिलेश सरकार की भूमिका से असंतुष्ट होकर खान ने इस सरकार में मिले यूपी हैंडलूम कार्पोरेशन के सलाहकार का राज्य मंत्री स्तरीय पद छोड़ा था।

दूसरी ओर, सपा प्रत्याशी के रूप में आयशा इस्लाम बतौर एकमात्र मुस्लिम प्रत्याशी, मैदान में हैं जो बसपा के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं।

राजनीतिक विशेषक डॉं. अनिल गर्ग कहते हैं कि पतंगों के इस शहर में यदि अल्पसंख्यक समुदाय अपने धर्मगुरु की घोषणा और स्वधर्मी प्रत्याशी के बीच चुनाव को लेकर भ्रमित नहीं हुआ और 17 अप्रैल को एकजुट होकर सपा, बसपा या कांग्रेस में से किसी एक के पक्ष में चला गया, केवल तब ही संतोष गंगवार की उड़ती पतंग खतरे में पड़ सकती है, वर्ना तो वह उड़ ही रही है।

युवाओं का एक समूह आप प्रत्याशी सुनील कुमार के साथ भी दिखाई दे रहा है लेकिन उन्हें अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। ऐसे में बरेली का झुमका वास्तव में किसके पाले में गिरेगा, यह तो 16 मई को मतगणना के बाद ही पता चलेगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:किसके पाले में गिरेगा बरेली का झुमका!