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मंत्री और घूस

अभी तक तो नेताओं का नाम रिश्वत लेने के मामलों में ही सुनाई पड़ता था, लेकिन असम के शिक्षा मंत्री रिपुन बोरा ने यह रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। राज्य सरकार के इस प्रभावशाली नेता को केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अधिकारी को दस लाख रुपए की रिश्वत देने के प्रयास में गिरफ्तार किया गया है। यह घटना तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के लिए गहरा झटका है। भले ही मुख्यमंत्री ने बोरा को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया, फिर भी उनके लिए बदनामी से बचना कठिन है। हत्या के जिस मामले में मंत्री महोदय के खिलाफ सीबीआई जांच कर रही थी, उससे अपना नाम हटाने के लिए उन्होंने जांच अधिकारी को रिश्वत देने का प्रयास किया। इस हरकत के बाद उन पर लगे आरोप की पुष्टि ही होती है। यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कुछ जनप्रतिनिधि अपना स्वार्थ साधने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। बोरा का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि उनकी छवि कभी भी साफ-सुथरी नहीं थी। फिर क्या मजबूरी थी जो उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया? नागरिकता विवाद में घिर कांग्रेसी सांसद सुब्बा के साथ बोरा का छत्तीस का आंकड़ा जग-ााहिर है। ऐसे में उनकी गिरफ्तारी को असम कांग्रेस की आंतरिक कलह का परिणाम भी समझा जा सकता है। आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जांच एजेंसी ने जो शिकांा कसा है उसे शीघ्र तर्कसंगत परिणाम तक पहुंचाए जाने की आवश्यकता है। बोरा के साथ सीबीआई ने एक व्यापारी तथा असम के एक पत्रकार क ो भी गिरफ्तार किया है। इससे नेताओं, व्यापारियों और सत्ता की दलाली कर रहे पत्रकारों की तिकड़ी के तिलस्म का अंदाज लगाया जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की अनदेखी करना अंतत: सभी दलों को भारी पड़ता है। बोरा जसे नेता आज अधिकांश दलों पर हावी हैं। लोकतंत्र में जनता की आस्था बनाए रखने के लिए जो सफाई अभियान चलाया जाना है, अच्छा हो राजनैतिक दल अब स्वयं इस दिशा में निर्णय ले लें।

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