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महंगाई पर यूपीए की बेचैनी और बढ़ी

झारखंड में ‘साख’ बचाने के लिए संघर्ष कर रहे यूपीए के सामने मुश्किल खड़ी हो गयी है। महंगाई के सवाल पर उबल रही जनता से आंखें मिलाने का साहस नहीं कर पा रहे हैं यूपीए के नेता। विधायकों-सांसदों को जनता के तल्ख सवालों का जवाब देते नहीं बन रहा है। यूपीए नेताओं के पास अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि की दलील जरूर है, लेकिन महंगाई की यह मार इतनी जबर्दस्त है कि लोग कोई दलील नहीं सुनना चाहते।ड्ढr उप मुख्यमंत्री स्टीफन मरांडी ने स्वीकार किया कि असर तो पड़ेगा। सब पर पड़ेगा। यह अलग बात है कि इंटरनेशनल मार्केट में तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण भारत में भी दाम बढ़ा है। यह केंद्र की मजबूरी है। अब फेडरल स्टेट में केंद्र और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह इसे नियंत्रित करने का भरसक कोशिश कर। इसके लिए 16 जून को दिल्ली में वैट पर बनी इंपावर्ड कमेटी की बैठक बुलायी गयी है, जिसमें सभी राज्यों में कीमतें स्थिर रहे, एकरूप रहे, इस पर विचार किया जायेगा।ड्ढr सटीक टिप्पणी करते हुए कांग्रेस विधायक सुखदेव भगत ने कहा-वर्ड फ्लू हुआ तो मुर्गे की जगह खस्सी अधिक कटने लगा। जबकि वर्ड फ्लू के लिए खस्सी बेचारा कहां जिम्मेदार था। इसी तरह महंगाई की मार भी चुनाव पर पड़ेगा। जबकि इसके लिए इंटरनेशनल मार्केट में ऑयल की कीमतों में हुई वृद्धि जिम्मेदार है। यही कारण है कि खुद अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह मूल्य वृद्धि को नियंत्रित कर सके।ड्ढr राजद विधायक गिरिनाथ सिंह भी कहते हैं कि सरकार को सबसे पहले देखना चाहिए कि जनता सुखी रहे। पेट्रॉलियम पदार्थो की कीमतों में एक साथ जिस तरह से बेहताशा वृद्धि कर दी गयी है, इसका असर सीधा-सीधा जनता की जेब पर पड़ेगा। सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि एलपीजी पर एकमुश्त 50 रुपये की वृद्धि कर दी गयी है। जबकि केंद्र सरकार को धीर-धीर मूल्य वृद्धि होनी चाहिए थी। इसका जनता के बीच गलत संदेश गया है और उसकी भावना के विपरीत है।ं

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