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सफेद हाथी पालेगा झारखंड बिजली बोर्ड

दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) के जिस गैस टरबाइन को झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड खरीदना चाहता है वह सफेद हाथी के समान है। यह टरबाइन कभी अमेरिका का स्क्रैप था, जिसे डीवीसी के मत्थे मढ़ दिया गया। अब डीवीसी जेएसइबी को दे पिंड छुड़ाना चाहता है। टरबाइन की खरीदारी को घाटे का सौदा माना जा रहा है, क्योंकि पेट्रोलियम पदार्थो की कीमत में बेतहाशा वृद्धि के कारण टरबाइन से विद्युत उत्पादन की लागत करीब 20 रुपये प्रति यूनिट से ऊपर होगी।ड्ढr जेएसइबी 1. 32 रुपये प्रति यूनिट की दर पर आम जनता को विद्युत देता है। यानी प्रति यूनिट 18. 68 रुपये का घाटा। भारत में गैस टरबाइन स्थापित करने के लिए 1में तत्कालीन केन्द्रीय उर्जा मंत्री बसंत साठे ने अमेरिका दौर के क्रम में वहां की सरकार से साथ समझौता किया था।ड्ढr भारत सरकार ने 7 अप्रैल 1ो अमेरीकी कंपनी जेनरल इलेक्िट्रक इंटरनेशनल के साथ करार किया। टरबाइन को पं. बंगाल में लगाना था, लेकिन वहां की सरकार के विरोध के कारण डीवीसी को दे दिया गया। इसके लिए डीवीसी ने अमेरिका के एक्िजम बैंक से 30 करोड़ रुपये का ऋण लिया। 52. 48 करोड़ की लागत से मैथन में गैस टरबाइन स्थापित हुआ। पहली और दूसरी यूनिट अक्तूबर 1में चालू हुई।ड्ढr तीसरी यूनिट अक्तूबर 1में। इसकी उत्पादन क्षमता 0 मेगावाट थी। लेकिन उत्पादन लागत अधिक होने के कारण डीवीसी ने वर्ष 2002 में टरबाइन को बंद कर दिया। तब प्रति यूनिट उत्पादन लागत 12 रुपया बैठती थी, जबकि डीवीसी 2. 80 रुपया प्रति यूनिट की दर से विद्युत बेचता था। यानी प्रति यूनिट 0 रुपये का घाटा। डीवीसी ने अमेरिकी बैंक से 30 करोड़ रुपये का जो ऋण लिया था, चक्रवृद्धि ब्याज के कारण आज तक चुकता नहीं किया जा सका है। दूसरी ओर डीवीसी को टरबाइन में काम करने वाले 30 कर्मचारियों को बैठाकर वेतन देना पड़ रहा है। ं

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