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रिश्वत के साथ प्रयोग

इधर तमाम युनिवर्सिटी कालजां क कार्सा क विज्ञापन दख, जान कैस-कैस अगड़म-बगड़म कार्स हैं। एक भी कार्स एसा नहीं है, जिसस प्रैक्िटकल लाइफ मं कुछ मदद मिलती हा, जैस रिश्वत कैस दं। मतलब रिश्वत लन क मामल मं ता लाग स्वयंमव हुनरमंद हा लत हैं, पर दन का काम थाड़ा टंशनात्मक सा हा लता है। शिक्षा के अभाव में लोगों का रिश्वत दन का पहला प्रयाग अक्सर बड़ा शर्मनाक टाइप हा जाता है। ट्रन मं सीट लन क लपट मं दा सौ रुपय हाथ मं लिय मैं टीटीई स चिरौरी कर रहा था। दा सौ रुपय मैंन उसक हाथ मं लगभग ठूंस ही दिय। टीटीई मेरे नौसिखुएपन से एकदम उखड़ गया-आप क्या समझत हैं मुझका। टीटीई एकदम स ईमानदार हा गया। मुझ बहुत शर्म आयी। बाद मं मैंन दखा टायलट क पास जाकर उसन कई कस निपटाय। पर मरा मामला उखड़ गया। कुछ महीनां बाद, फिर मुझे सीट की जरूरत आन पड़ी। इस बार मैंन टीटीई स कहा प्लीज उधर आइय, मैं टायलट क पास आपका इंतजार कर रहा हूं। टीटीई एक घंट बाद वहां पहुंचा और बाला सीटं ता सारी मैंन निपटा दीं। जिसन वहां आन दि स्पाट दिए, मैंन सीट उसी का द दी। मैंन कहा जी आप खुल आम लत हैं। पर कुछ महीन पहल मर साथ यह हादसा हा गया। टीटीई न बताया- भारत बहुत तजी स प्राग्रस कर रहा है। कुछक महीनां मं इतनी प्राग्रस हा ली है कि अब ता खुलआम ली जाती है। आप पता नहीं, कहां रहत हैं। भारत प्राग्रस कर गया, हम पिछड़ लिय जी। एक विकट हादसा हुआ एक सरकारी डिपार्टमंट मं। एक मैडम अफसर थीं। मैंन अंदाज लगाया कि य ता रिश्वत स परहज करती हांगी। पूरी फाइल वगैरह सैट करक मैं पहुंचा। मैडम न पाँच बार मं पचास कागज और मंगाय। मैंन लाकर दिय। मैडमजी स्ट्रिक्ट हांगी। एक दिन मैडम उखड़ गयीं-क्या आप लडीज समझ कर मुझ ठग लंग। जी मैं समझा नहीं-मैंन लडख़ड़ा कर कहा। जी जा रकम औरां का दत हैं, वही यहां भी धर दीजिय -मैडमजी न डांटा। कई दफ्तरां मं जंडर का भदभाव नहीं है। वहां सशक्ितकरण हो गया है। भारत प्राग्रस कर गया है, यह बात उस दिन समझ मं आयी। एक कार्स बन कि रिश्वत कैस दं। ईमानदार स दिखन वाल बंद ज्यादा रिश्वत लत हैं, या आम रट स ही लत हैं। बुद्धिजीवी का रिश्वत कैस दं। इससे जुड़े कई व्यवहारिक ही नहीं तकनीकी मसले भी हैं। मसलन काम और रिश्वत में कितना अनुपात होना चाहिए? बढ़ती महंगाई में रिश्वत का ट्रेंड कैसे बदलता है? रिश्वत की सर्वदलीयता का सिद्धांत वगैरह।ं

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