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खुद को ही ‘सरकार’ समझ बैठे

पिछले एक माह में पीएमसीएच में जूनियर डाक्टरों के मरीाों से र्दुव्‍यवहार और मारपीट की घटनाएं चिंताजनक ढंग से बढ़ी हैं। इन घटनाओं पर अक्सर पुलिस का रवैया टालमटोल व बीच-बचाव वाला ही रहा है। शायद इसी वजह से जूनियर डाक्टरों का मन बढ़ता गया और अब वहां के हालात इस कदर बिगड़ गए कि देश का एक प्रतिष्ठित अस्पताल गुंडागर्दी के अड्डे के रूप में पहचाना जाने लगा।ड्ढr ड्ढr सरकार की मंशा तो इसे एक उत्कृष्ट अस्पताल की शक्ल देने की है। इस दिशा में काम भी हुए और मरीाों की तादाद भी बढ़ने लगी थी। लेकिन, जूनियर डाक्टरों के एक वर्ग ने इन सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया। अब तो मरीा वहां इलाज कराने के लिए जाने से भी डरने लगे हैं। यदि यही हाल जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अस्पताल के वार्डो में सन्नाटा नजर आएगा और मरीाों की जगह खाली बेडों पर कुत्ते-बिल्लियां धींगामुश्ती करते नजर आएंगे। यदि शुरूआती घटनाओं को स्वास्थ्य महकमे और अस्पताल प्रशासन ने गंभीरता से लिया होता तथा पुलिस ने नरम रवैया नहीं अख्तियार किया होता तो वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं होती, जो 5 जून को हुई। दरअसल, जूनियर डाक्टरों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उनके मरीाों से र्दुव्‍यवहार की असलियत अखबारों व चैनलों के माध्यम से आम जनता व सरकार तक पहुंचे। सच बात तो यह है कि ये जूनियर डाक्टर खुद को ‘सरकार’ ही समझ बैठे हैं। मीडियाकर्मियों पर जिस ढंग से उन्होंने हमला किया, वह कोई पेशेवर असामाजिक तत्व ही कर सकता है। इनकी ढिठाई भी चिंतित करने वाली है। मरीाों को गत दिनों मारा-पीटा और उल्टे मुकदमा भी कर दिया। इन पर कोई कार्रवाई हुई नहीं, जिससे एक के बाद एक ताबड़तोड़ घटनाएं होती गईं।ड्ढr पत्रकारों पर हमले ने आम जनता को चिंतित कर दिया कि कैसे लोग इस पेशे में आ गए हैं? डाक्टरी का पहला अध्याय ही आखिर ये क्यों भूल गए?ड्ढr ड्ढr बहरहाल मीडिया पर हमले की घटना ने पुलिस और प्रशासन की नींद खोली है और अब दोषी डाक्टरों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट लिए गए हैं। सिर्फ डाक्टरों की गिरफ्तारी ही पर्याप्त नहीं है। मानव सेवा के लिए जिस आदर्श पेशे से वे जुड़े हुए हैं, उसे उन्होंने कलंकित किया है। डाक्टरों के शीर्ष संगठनों को इनके विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे इस पेशे की गरिमा बची रह सके।ं

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