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नैन से नैनों तक कई उलटबाँसियाँ जी रही दुनिया

नैन, (न्यूली अक्वीािटिव नेशंस) यानी उदीयमान अधिग्रहणकर्ता देश, विश्व-बाजार के शब्दकोश में अभी हाल में जुड़ा एक शब्द है। यह एशिया और लातिन अमेरिका के उन विकासशील देशों को परिधि में लेता है, जो इधर ताकतवर होकर उभरे हैं और हालांकि अब तक योरोप और अमेरिका ने अपनी तमाम महत्वपूर्ण बैठकों और वित्तीय परिसंघों से अब तक उनको हिकारत से बाहर रखा हुआ था, उनकी चर्चित कंपनियों व बैंकों का ‘नैन’ देश धड़ाधड़ अधिग्रहण कर रहे हैं। विकसित देशों में कार्पोरट विलय और अधिग्रहण में गए वर्ष 43 फीसदी गिरावट आई, लेकिन नैन देशों की ग्लोबल विलयन अधिग्रहण कार्रवाई में 17 प्रतिशत का क्षाफा हुआ है। वर्ष 2007, के दौरान दुनिया की कुल आर्थिक प्रगति का 23 भाग नैन मुल्कों की बिरादरी ने रचा और विशेषज्ञों की यह भी भविष्यवाणी है, कि 2008 में ‘नैन’ देशों में आर्थिक प्रगति दर औसतन 6.7 प्रतिशत होगी। जबकि पूर्व-महाबली देशों : अमेरिका, यूरो क्षेत्र तथा जापान में यह दर 1.3 प्रतिशत तक ही सिमटी रहेगी। लातिन अमेरिका देश ब्राजील इस नई बिरादरी की बढ़ती आर्थिक ताकत का एक अच्छा उदाहरण है। अन्न तथा विश्व पेट्रोल दामों में अभूतपूर्व उछाल के वक्त यह देश गन्ने से बने एथानॉल, भारी तादाद में (ऑफ-शोर) तेल की बरामदगी, कृषि क्षेत्र को बढ़ाने की प्रचुर संभावनाएॅं लिए बड़े भू-भाग, मीठे जल संसाधनों के बड़े कुदरती भण्डार और खनिज सम्पदा के बूते आज आकण्ठ र्का और इराक युद्ध से उपजी घरलू जटिलताओं से घिरे रईस पड़ोसी उत्तरी अमेरिका के लिए ईष्र्या और सराहना का विषय है। एशिया में चीन और भारत कुछ भिन्न वजहों से ऐसे ही तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उनके विशाल बाजार, युवा आबादी तथा विशाल कृषि क्षेत्र उनकी प्रगति की मुख्य वजहें हैं। और अभी वे कायम रहेंगी। गुजर दो सालों में अभूतपूर्व और विश्वस्तरीय प्रदर्शन और दुनिया से भरपूर सराहना पाने के बाद भी घरलू स्तर पर हमार यहॉं एक सुरसाकार निराशा कायम दिखती है। और हमारा विपक्ष ही नहीं, संप्रग समर्थक वामदल भी फिलवक्त उसका नकारात्मक केन्द्रबिन्दु बने हुए हैं। वामदल बंगाल-केरल की भौगोलिक सीमाओं में अपना वर्चस्व बनाए रखने की मजबूरी के चलते चार बरसों से कांग्रेस को समर्थन देते आए हैं, लेकिन प्रगति दर को कायम रखने को कोई भी कड़वा फैसला हुआ नहीं, कि वे कोलकाता में चक्काजाम कर कांग्रेस पर पत्थर फेंकने लगते हैं। विपक्षी राजग का विरोध भी कुतर्की लगता है। उसने खुद भी इन्हीं आर्थिक नीतियों के रथ को पाँच साल हाँका था, और हर बार (बजट से पहले) गैस-पेट्रोल के दाम भी बढ़ाए थे। लेकिन पेट्रोल-मूल्यों में बढ़ोतरी को लेकर वे भी आज सड़कों पर सरकार के पुतले जला रहे हैं। ऐसे सड़क-छाप प्रदर्शन की घड़ियों में जब लोकतांत्रिक शिष्टता का नकाब अक्सर फट जाता है, राजनैतिक दलों का असली चेहरा उाागर हो जाता है। दुनिया का सत्ताक्रम उलट चुका है। इस नए वक्त में गोर देशों को दिखने लगा है कि उन्हें अब अपने भूगोल और बदलती आबादी की अपेक्षाओं की तहत नैन देशों से दुनियादार समझौते करने ही होंगे। और वे चतुराई से घरलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चो पर पहल करने भी लगे हैं। भले ही अपने भीतर कायम रंगोद और लैंगिक पूर्वग्रहों को पूरी तरह मिटाने में अभी उनको लंबा वक्त लगेगा। और तब भी हो सकता है वे जड़ से न मिट सकें। अमेरिका राजनीति में ओबामा और हिलेरी हाशिए पर खड़े अश्वेतों-स्त्रियों को क्रमिक रूप से सत्ता में लाने वाली नई हवा के घरलू प्रतीक हैं तो भारतीय और चीनी नेतृत्व के लिए बिछा जाता प्रशासन विदेश नीति के नए रुख का। इसमें कोई शक नहीं, कि अपनी इस नई छवि के लायक आत्मविश्वास अर्जित करने की भारत की डगर भी बहुत तेज, सुगम या निरापद नहीं होगी। इतिहास में किसी भी तरक्कीयाफ्ता देश की नहीं होती है। लेकिन फिर भी अग्रगामी भारत को अब अपनी पारंपरिक निराशावादिता से ऊपर उठ कर शहरों से गाँव तक लोकतांत्रिक बँटवार की एक ठोस और कारगर व्यवस्था बनाने की जरूरत है! अफसोस कि इस घड़ी में भी कई भाई लोग राष्ट्रीयता के नाम पर अखिल भारतीय सोच की बजाय क्षेत्रीयता के निहायत क्षुद्र आग्रहों से ही चिपके हैं। किशन पटनायक ने कभी एक बहुत मार्के की बात कही थी, कि लोकतंत्र में ‘सख्ती की नीति’ और ‘दृढ़नीति’ में फर्क होता है। सख्ती की नीति में नीति गौण मान ली जाती है और दमन प्रमुख हो जाता है। जबकि दृढ़ नीति में एक स्पष्ट राष्ट्रीय सर्वानुमति पर आधारित नीति केंद्र में होती है। दृढ़ नीति न्याय के पक्ष में खड़ी रहती है, जबकि सख्ती की नीति अक्सर आगे चलकर अन्यायी बन जाती है। आरक्षण पर गुर्जरों के प्रतिरोध और पेट्रो कीमतों पर प. बंगाल वाम सरकार के प्रायोजित बंद को देखकर लगता है कि अगर देश को लोकतंत्र और संघीय मर्यादाएॅं कायम रखनी हैं तो जरूरत सख्ती नहीं, एक दृढ़नीति की है। सख्तदिली से हाारों नागरिकों को भीषण तकलीफ देने वाले प्रदर्शन और प्रायोजित चक्काजाम तथा तालाबंदी कराने और फिर टी.वी. पर गलाफाड़ नारबाजी करने की बजाय सभी दलों को पूर बदलते परिदृश्य पर एक गंभीर राष्ट्रीय बहस छेड़ने की जरूरत है, जिससे देश समझे और दृढ़ता से तय कर कि वह कहाँ खड़ा है और आगे किधर जाना है। राजनैतिक पक्ष विपक्ष ही नहीं, तमाम गुटों, समुदायों, संगठनों और मीडिया की शाखाओं की भी ऐसी बहसों में सक्रिय भागीदारी संभव होनी चाहिए, और वह भी एक समयबद्ध प्रक्रिया के रूप में! सभी प्रभावित समूहों के बहुमत और राष्ट्रीय सर्वानुमति के आधार पर एक ऐसी दृढ़नीति भला क्यों नहीं गढ़ी जा सकती, जो संप्रग की सरकार हो या राजग की, या तीसर-चौथे मोर्चे की, सब के लिए समान रूप से स्वीकार्य और उपादेय रहे? गुर्जर बनाम जाट बनाम मीणा बनाम मलाईदार परत या रामसेतु बनाम नया जलमार्ग या वोक्कलिंगा बनाम लिंगायत जसे संकीर्ण और छोटे मुद्दों को लेकर बिल्लियों की तरह झगड़ते हुए प्रगति के राजपथ पर चक्काजाम कर देना सयानापन कतई नहीं माना जा सकता। दुनिया के दो-तीन सदी पुराने आर्थिक शक्ित ध्रुवों में आ रहा यह भारी बदलाव आज राष्ट्रसंघ की रक्षा परिषद की सदस्यता या जी-8 शिखर सम्मेलन में न्योते जाने जसी चिंताओं को भी अप्रासंगिक बना रहा है। गुट-निरपेक्षता का चौथा उठाला तो कब का हो ही चुका। आने वाले वक्त में प्रमुख विचारणीय मुद्दे भिन्न हैं। वे पर्यावरण संरक्षण और धन-धान्य के न्यायपरक वितरण से जुड़े हुए हैं और इनका सही निराकरण अब सिर्फ स्थानीय या क्षेत्रीय औजारों से कर पाना संभव नहीं रह गया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संसाधनों के मुस्तैद और समवेत इस्तेमाल से ही आने वाले वक्त में आत्मरक्षा संभव होगी। ध्रुव प्रदेश की बर्फ पिघलने, उष्णकटीय जंगलों के उाड़ने, अफ्रीका-आस्ट्रेलिया के सूखे और अन्न तथा पेट्रो कीमतों की ऊॅंची होती दरों के बीच जापान से होनोलूलू तक आज एक अंर्तसबंध बन चुका है। इसीलिए आज की तारीख में समय रहते राष्ट्रीय सर्वानुमति बनाने की बजाय विरोध के नाम पर प्रांतीय चक्काजाम या खाली मटकों, सिलेंडरों के सड़क छाप प्रदर्शन करते जाना आत्मघाती होगा, मूर्खता तो वह है ही।ं

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