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मौसम बहुत कुछ कह रहा है, सुनें तो

या आपको याद है कि मई-ाून के महीनों में इस तरह का मौसम रहा है? नहीं ना। तो यकीन मानिए, मौसम कुछ कह रहा है। इसे समझने की कोशिश करं। वैसे, मौसम के संकेत खतर वाले हैं। मुंबई में मानसून आ गया और समय से पहले। ऐसा पहले भी हुआ है। लेकिन तमाम तैयारियों के बावजूद इस बार महानगर में ज्यादा तबाही की आशंका है। इसका कारण सुनिए पर्यावरणविद गिरीश राउत के शब्दों में, ‘समंदर और उसके किनारों के साथ छेड़छाड़ एवं मैंग्रोव के नष्ट करने से समंदर में ज्वार भाटे का मिजाज खतरनाक हो रहा है।’ (विवरण पेज 17 पर) शुक्र है, दिल्ली-एनसीआर में समुद्र नहीं है, अन्यथा क्या हाल होता, खुद कल्पना कर लें। दिल्ली विश्वविद्यालय के भूगोलवेत्ता डॉ. आर.बी. सिंह का कहना है कि दिल्ली में पश्चिमी विक्षोभ से बारिश का सिलसिला सर्दियों में चलता रहा है लेकिन पिछले पांच-छह साल के दौरान पश्चिमी विक्षोभ और अपर एयर साइक्लोनिक सरकुलेशन का मिला-ाुला प्रभाव मई-ाून महीनों में इतना अधिक हुआ है। मौसम के इस तरह के बदलाव का एक कारण नहीं है और यह असर किसी एक क्षेत्र नहीं, दुनिया भर में देखा जा रहा है। दिल्ली समेत भारत के कई इलाकों में गर्मी कम हो गई है तो यूरोप के कई देशों में गर्मी बढ़ गई है। आíक्टक दुनिया क दोगुनी दर स गर्म हो रहा है और बहुत मुमकिन है कि ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर पूरी तरह पिघल जाए और समुद्र का जल स्तर कई मीटर उठ जाए। मालदीव-जैसे छोटे द्वीप देशों का अस्तित्व खतर में है। प्रशांत महासागर का 000 आाबादी वाला द्वीप किरिबाती डूबने वाला है (देखें पेज-20)। भारत समेत दुनिया भर क ऊंच पहाड़ों पर मौजूद हिमनद (ग्लशियर) इतनी तजी स पिघल रह हैं कि उनकी वजह स प्रमुख डल्टाओं मं जल संतुलन गंभीर रूप स बाधित हो रहा है और इसस फसलों की पैदावार कम हो रही है। दुनिया में खेती की शुरुआत मौसम बदलने से हुई और मौसम बदलने से ही इसका अंत हो सकता है। दुनियाभर में खाद्यान्न संकट के लिए कुछ हद तक जलवायु परिवर्तन भी जिम्मेदार है।

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