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30 मई, 2020|5:29|IST

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राजनाथ सिंह राजयोग के धनी

राजनाथ सिंह राजयोग के धनी

भाजपा की भावी सरकार की प्रबल संभावनाओं के बीच राजनाथ सिंह जब 5 अप्रैल को लखनऊ से लोकसभा चुनाव का पर्चा दाखिल कर रहे थे, तब दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में बैठे एक पदाधिकारी ने टिप्पणी की कि उन्होंने सीट तो प्रधानमंत्री वाली ही चुनी है। यह टिप्पणी न तो अनायास है और न ही महज अटकलबाजी।

किस्मत के धनी राजनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दूसरा कार्यकाल ऐसे समय मिला जबकि पार्टी में कोई भी इसकी संभावना नहीं देख रहा था। हालांकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हैं और राजनाथ पूरी तरह से उनके साथ खड़े हैं।

केंद्र में सरकार बनने पर राजनाथ का उसमें मंत्री बनना तय है, लेकिन पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर और मोदी के नाम पर 272 का जादुई आकडम़ा न मिलने की स्थिति में पार्टी जिन विकल्पों पर विचार कर सकती है, उनमें राजनाथ भी शामिल हैं। अगर लालकृष्ण आडवाणी इसी वैकल्पिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए चुनाव मैदान में डटे हैं तो पार्टी के भीतर राजनाथ भी काफी मजबूत हैं। उनको संघ व मोदी का समर्थन मिलने की संभावना किसी और नेता से ज्यादा है। हालांकि खुद राजनाथ इस तरह की किसी काल्पनिक स्थिति की चर्चा नहीं करते। वह मोदी के साथ सबसे मजबूती के साथ खड़े हैं।

मोदी के सारथी बने है, आडवाणी की जिद के आगे नहीं झुके
भौतिक विज्ञान के व्याख्याता रहे राजनाथ को विज्ञान की प्रयोगशालाओं से ज्यादा राजनीति का अखाड़ा पसंद आया। राजनीति भी ऐसी कि विरोधी तो छोडिए अपने भी उनके मन की थाह नहीं ले सकते। बीते एक साल में पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी के पुरजोर विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में सबसे अहम भूमिका राजनाथ की रही। गोवा से लेकर दिल्ली तक आडवाणी के विरोध के सामने वह ऐसे अड़े कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी उनकी पीठ थपथपानी पड़ी। आखिर संघ के एजेंडे को बिना किसी दबाब में आए उन्होने पूरा जो किया था।

ताकत
भव्य व्यक्तित्व व ओजपूर्ण वाणी
उत्तर भारत में प्रभावी नेता
सभी का साथ लेकर चलने की क्षमता
अपने दायित्व को बिना दबाव के पूरा करना
राजनीतिक महत्वाकांक्षा को हावी न होने देना
परिवारवाद का आरोप नहीं

कमजोरी
विरोधियों पर नहीं कर पाते हैं सख्ती
अपने गृह राज्य में कमजोर संगठन
टिकटों के वितरण में राज्यों की सलाह को दी ज्यादा तवज्जो

नकल अध्यादेश से मिली थी देशव्यापी पहचान
चौदह साल की उम्र में 1965 में अखिल विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ राजनाथ का सफर 1972 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मिर्जापुर शहर के शहर कार्यवाह से होता हुआ 1974 में जनसंघ की मुख्यधारा में मिला। जेपी आंदोलन व आपातकाल की लड़ाई ने उनकी राजनीतिक नींव को मजबूत किया। राष्ट्रीय स्तर उनकी पहचान उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री के रूप में हुई, जब उन्होंने नकल अध्यादेश के जरिए प्रदेश की ध्वस्त शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर ला खड़ा किया। सत्ता व संगठन के हर दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाने की वजह से ही वह आडवाणी के बाद दूसरे नेता है जो तीसरी बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं।

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