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चांगल के अंधे कानून को बदलने की कवायद

रक्षक कानून भक्षक बनने लगे तो उसे क्यों बने रहना चाहिए? अंग्रेजों के बनाये दूसर कानूनों की तरह इंडियन फॉरस्ट ऐक्ट 1भी इसी सवाल से घिरा रहा है। वनरक्षा के नाम पर वनों और आसपास में रहनेवाले ग्रामीणों पर लाखों मुकदमे इसके सबूत हैं।ड्ढr आजिज गांववालों का जंगल से मोह टूटने लगा। सदियों पुराने रिश्ते में दुराव आया। इस परायेपन का नतीजा हुआ, वनों का सफाया। तीस फीसदी वनों वाले झारखंड में सात साल के भीतर बीस हाार मुकदमे हुए। अधिकांशत: उन पर, जो वनों के संग, वनों पर निर्भर रहे। जलावन की लकड़ियों से लेकर परिवार की वक्त-बेवक्त जरूरतों के लिए इक्का-दुक्का पेड़ काटने की सजा मिली सालों-साल सीखचों की कैद! जबकि, वनोत्पादों पर इनका नैसर्गिक और वैधानिक, दोनों अधिकार बनता है। जाहिर है, अंग्रेज शासकों का वह गोलमोल कानून आज नौकरशाही का हथियार बन गया। आवाज उठती तो कहा जाता-कानून अंधा होता है! फिर, ऐसा कानून किसलिए? लेकिन, उन्हें बदलने का पावर जिनके पास है, वह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारं! संयोगवश, झारखंड वन विभाग के कुछ अधिकारी इसके अपवाद हैं। उन्होंने एक क्रांतिकारी संकल्प लिया है। अब, छोटे-मोटे मामलों में किसी ग्रामीण पर मुकदमा तभी चलेगा जब गांववालों की सहमति होगी। संकल्प में फॉरस्ट एक्ट पर एक सीधा वार भी है। अब, आम आदमी भी वन संबंधी अपराधों के खिलाफ मामला दर्ज करा सकता है। इस संकल्प के सूत्रधार अरविंद कुमार कहते हैं- हमारी नीयत फॉरस्ट एक्ट को आहत करना नहीं, उसके ‘वन संरक्षण’ नार को साकार करना है, जो जनसहयोग से ही संभव है।ड्ढr वन विभाग में वरिष्ठ अफसर, अरविंद कुमार का यह प्रयोग हाारीबाग के तीन सौ गांवों में असरदार रहा। लिहाजा, राज्य सरकार को भी इस संकल्प पर मुहर लगानी पड़ी। लेकिन, ‘जंगल में मंगल’ तभी होगा, जब उस अंधे कानून को बदलने की यह कवायद मुकाम हासिल कर।ड्ढr

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  • Web Title: चांगल के अंधे कानून को बदलने की कवायद