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फिर 15 हचाारी

यूं पांच-छह सौ अंक की गिरावट इस दौर के शेयर बाजार के लिए खास मायने नहीं रखती, लेकिन सोमवार को दर्ज सेंसेक्स की टूटन कई वजहों से गौरतलब है। एक तो बाजार 15 हाार की मनोवैज्ञानिक सीमा से भी डेढ़ सौ अंक नीचे का स्तर छू आया है। जिस सेंसेक्स के दिसंबर तक 25 हाार तक पहुंच जाने की भविष्यवाणियां कर दी गई थीं, उसे इस अधोगति में देखना दुखदायी है, खासतौर पर उस फीलगुड बिरादरी के लिए, जो सेंसेक्स के हर उछाल को सरकार की अर्थनीतियों की सफलता के रूप में दर्ज कराती रही है। दूसर, कच्चा तेल शेयर बाजारों पर सीधे असर डालने की स्थिति में पहुंच गया है। तेल उत्पादक और निर्यातक देशों की ताजा बैठक से जाहिर है कि वे ऊं चे दामों पर भी बरकरार विश्व मांग के दोहन का मोह संवरण नहीं कर पा रहे और निकट भविष्य में दाम के मोर्चे पर किसी बड़ी राहत के आसार नहीं हैं। लेकिन गिरावट का तीसरा और घरलू अर्थतंत्र के नजरिए से सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक बार फिर भारतीय अर्थतंत्र में ब्याज दर और सीआरआर में क्षाफे जसी वे आवाजें उभरने लगी हैं जो मंदी झेलते औद्योगिक सेक्टर का कलेजा हिला सकती हैं। जाहिर है ये सारी खबरं 8.24 फीसदी घरलू महंगाई के प्लेटफार्म पर सुनने को मिल रही हैं और सबका एक-दूसर से रिश्ता है। भारत ही नहीं, समूचे एशिया और यूरोप-अमेरिका में उसके डरावने अक्स नजर आ रहे हैं। लेकिन इस सबके बावजूद देश-विदेश में आशा के संकेत भी हैं। चीन, अमेरिका और जापान समेत दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों ने कच्चे तेल के बाजार पर बैठक की है जिससे उम्मीद बंधी है कि तेल बाजार के संकट का कोई आर्थिक-राजनीतिक समाधान निकल सकता है। विश्व बैंक ने भी उम्मीद जताई है कि आंशिक तौर पर तेल के दाम काबू में आ जाएंगे। सकारात्मक पहलू वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के इस ऐलान का भी है कि रिार्व बैंक महंगाई और कच्चे तेल के संकट से निपटने के हरसंभव राजकोषीय उपाय अपनाएगा। ये समाधान पब्लिक और इंडस्ट्री के लिए फौरी तौर पर तकलीफदेह हो सकते हैं, लेकिन उन्हें एक विश्व संकट से जूझने के विराट ग्लोबल आयोजन के हिस्से के तौर पर देखना बेहतर होगा।ड्ढr

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