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पुलिसिया चेहरा

हरियाणा के रोहतक में किए बलात्कार पीड़िता महिला की आत्महत्या ने यह जता दिया है कि तमाम तरक्की के बावजूद हमारा बुनियादी तंत्र वहीं है, जहां आजादी के पहले था। पुलिस और जनता का रिश्ता अब भी वैसा ही है, जसा गुलामी के दिनों में था और इसे सुधारने की कोई ईमानदार इच्छा हमार राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में नहीं है। यह कोई पहली या अनोखी घटना नहीं है, जब किसी अपराध के आरोपी की पत्नी या परिवार की किसी महिला के साथ पुलिस वालों ने बलात्कार किया। ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं और इन महिलाओं के साथ बदसलूकी और अभद्र व्यवहार तो रो ही देश के तमाम थानों में होता है। इनमें से एकाध ही महिला पुलिस के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करती है और जो करती है, उसका क्या हश्र होता है, यह रोहतक की इस घटना से पता चलता है। दरअसल पुलिस को अमानवीय और बर्बर बनाए रखने में राजनेताओं का हित है, क्योंकि ऐसी पुलिस को वे अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। दमनकारी पुलिस का इस्तेमाल करना और उसके दमन से लोगों को संरक्षण देना, ये दोनों ही राजनीति के खेल के आजमाए हुए नुस्खे हैं। इसीलिए पुलिस सुधारों पर पिछले साठ साल में हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़े हैं। न हमार देश में पुलिसकर्मियों के जीवन को अमानवीय स्थिति से उबारने के लिए कोई खास कदम उठाए गए हैं, न उनके व्यवहार को मानवीय बनाने के लिए। पुलिस को सिखाया यही जाता है कि वह किसी व्यक्ित से उसकी सामाजिक हैसियत और ताकत के हिसाब से ही व्यवहार कर, इसलिए समाज के ताकतवर हिस्से तो कानून को मानते ही नहीं और कमजोर वर्ग, खासतौर पर इस वर्ग की महिलाएं उनकी शिकार बनती हैं। लेकिन ऐसे समाज में जहां लोकतांत्रिक चेतना बढ़ रही है, पाषाण युग की पुलिस अप्रासंगिक होती जाती है। इन दोनों का टकराव कभी रोहतक की आत्महत्या की तरह, कभी नागपुर में महिलाओं के हाथ बलात्कारी की हत्या के रूप में। ये समाज के लिए खतरनाक हैं और बार-बार पुलिस सुधार की जरूरत को रखांकित करते हैं।ड्ढr

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