अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हर साल बनीं योजनाएं फिर भी नहीं बुझी प्यास

ैमूर में जल संकट नई बात नहीं है। यहां के नागरिक इस समस्या से हर साल जूझते हैं। खासकर पहाड़ों के ऊपर बसे गांवों और तलहटी में रहने वाले लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ता है। पानी की तलाश में पशुपालक अपने मवेशियों के साथ फरवरी माह में ही पलायन कर जाते है और जुलाई-अगस्त में लौटते हैं। जंगली जानवर भी पानी की खोज में मैदानी इलाकों की ओर भागने लगते हैं।ड्ढr ड्ढr अधौरा के लोग जहां पहाड़ों से रिस रहे पानी (चुआं) से प्यास बुझा रहे हैं, वहीं कुदरा के लोग नदी के बालू को खोदकर पानी निकालने को विवश हैं। अधौरा के पानी में इतना काफी आयरन है कि पाइप में ही छेद हो जाता है। रामपुर के ग्रामीण तो कोसों दूर नदी में जाकर बहंगी से पानी ला रहे हैं। भगवानपुर और चैनपुर प्रखंडों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। कमोबेश भभुआ शहर के भी यही हालात हैं । पानी के लिए भी घंटों नम्बर लगाना पड़ता है। जलस्तर काफी खिसक गया है। जिले के 15457 चापाकलों में 46चापाकल विशेष मरम्मत के अभाव में बंद पड़े हैं। पेयजलापूर्ति योजनाएं छलावाड्ढr विपिन कुमार बेगूसरायड्ढr गर्मी का मौसम शुरु होते ही भूगर्भीय जलस्तर के गिरने से जिले भर में पानी का संकट उत्पन्न हो गया है। पीएचईडी की जलापूर्ति योजनाएं ग्रामीण इलाकों में ही नहीं शहरी क्षेत्र में भी हाथी के दांत साबित हो रही हैं। अधिकांश आबादी आज भी पानी के लिए चापाकलों पर निर्भर है। चापाकलों से या तो पानी का निकलना ही बंद हो गया है या फिर पानी की मात्रा इतनी कम रहती है कि लोगों की जरूरतें पूरी नहीं होती। सर्वाधिक संकट की स्थिति गंगा नदी के किनार स्थित दर्जनों गांवों की है जहां पहले से ही पानी का लेयर नीचे था। गर्मी का मौसम शुरु होते ही लेयर और अधिक गिर गया। विभाग के कार्यपालक अभियंता नागेश्वर शर्मा बताते हैं कि बछवाड़ा से साहेबपुरकमाल प्रखंड तक गंगा नदी के किनार बसी 68 पंचायतों में पानी का लेयर अभी 28 फीट पर है। विभाग द्वारा लगाए गए तीन हाार से अधिक चापाकल खराब पड़े हैं। पेयजलापूर्ति के लिए करोड़ों की राशि खर्च करने के बावजूद इसका लाभ लोगों को नहीं मिल रहा है। श्री शर्मा ने दावा किया है कि बखरी पश्चिम, बखरी पूरब, मक्खाचक, मंसूरचक, भगवानपुर व मटिहानी में नवनिर्मित पानी टंकी से पेयजलापूर्ति की जा रही है। भागलपुर में पेयजल का संकटड्ढr दीपक कुमार मिश्रा भागलपुर भागलपुर जिले में चौतरफा जल संकट है। शहर हो या गांव हर तरफ लोगों के हलक सूख रहे हैं। शहर मेंतो 25 करोड़ की राशि खर्च करने के बाद भी लोगों को पानी की तलाश करनी पड़ती है। भीषण गर्मी में कुएं का साथ छूट चुका है तो जलस्तर नीचे जाने से चापाकल भी बेदम है। गंगा की धारा दूर चली जाने से बरारी वाटर वक्र्स पर भी जल संकट छा गया है। शहर को यहीं से नगर निगम जलापूर्ति करता है। यह बिडंबना ही है कि हर साल बाढ़ से जिले का आधा से अधिक क्षेत्र डूब जाता है। इसके बाद भी गर्मी में जलसंकट से रू-ब-रू होना पड़ता है। सबसे खराब स्थिति शहर की है। गंगा किनार रहने के बाद भी लोग पानी के लिए भटकते रहते हैं। शहर में बरारी वाटर वक्र्स और 30 बोरिंग के जरिए जलापूर्ति होती है। शहर में रोजाना 1 करोड़ गैलन पानी की खपत है लेकिन निगम मात्र 40 लाख गैलन की ही आपूर्ति कर पाता है । 123 साल पुराने बरारी वाटर वक्र्स की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो रहा है। इसका एक ही प्लांट चालू है, दूसर का जीर्णोद्धार कच्छप गति से हो रहा है। यही स्थिति बन रहे नए दो दर्जन से अधिक बोरिंगों की है। बिजली नहीं रहने पर वक्र्स या पंप को चलाने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: हर साल बनीं योजनाएं फिर भी नहीं बुझी प्यास