अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बढ़ते शहरों के उचाड़ते बसेर

ाब भूकंप या सुनामी जसी कोई प्राकृतिक आपदा किसी का घर उााड़ दे तो वह किसी को दोष नहीं दे सकता। ऐसे में बहुत पीड़ा और तकलीफ होती है, लेकिन ज्यादातर लोग जिन्दगी के साथ आगे बढ़ते रहते हैं। फिर मदद करने वाले भी होते हैं। लेकिन तब क्या होता है, जब आपका घर बुलडोरों के जरिए जमींदोज कर दिया जाता है, क्योंकि एक शहर यह तय करता है कि आपको वहाँ नहीं रहना है, क्योंकि जिस जगह पर आप और शायद आपके माता-पिता भी रहते आए हैं वह जगह अब किसी ‘सार्वजनिक उपयोग’ के लिए जरूरी है। कौन से ‘सर्वजन’ और कौन सा ‘उपयोग?’ आप जवाब नहीं मांग सकते। ऐसे में पीड़ा और दु:ख उतना ही बड़ा होता है जितना किसी प्राकृतिक आपदा में, लेकिन असहायता ज्यादा होती है, क्योंकि यह पीड़ा सालों के छद्म, झूठी उम्मीदों और टूटे वायदों के बाद आती है। मदद भी मिलना मुश्किल होती है। फैसला हो चुका होता है, सरकार की तय की हुई किसी नई जगह पर जाइए या नष्ट हो जाइए। दिक्कत यह है कि अगर आप नई जगह चले गए तो भी विनाश संभव है। क्योंकि नई जगहें अक्सर दूर-दराज होती हैं, जहां न तो आपको आस-पड़ोस मिलता है, न रोगार, न सुरक्षा। एक नई, ठोस शोध पर आधारित किताब ‘स्वेप्ट ऑफ द सैप : सर्वाइविंग इविक्शन एंड रिसेटलमेंट इन देल्ही’ आई है जिसे कल्याणी मेनन सेन और गौतम भान ने लिखा है (प्रकाशक : योदा प्रसे) और जिसमें ऐसे कई तथ्य विश्वसनीय और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं। इस किताब में उन परिवारों का लेखा-ाोखा है जो दिल्ली में यमुना किनार के यमुना पुश्ता नामक इलाके से 2004 में बवाना पुनर्वास कॉलोनी में बसाए गए थे, जो दिल्ली के सीमांत पर है। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि पर्यटन मंत्रालय उस इलाके को एक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करना चाहता था। ऐसे में वहाँ की झुग्गी बस्ती जिसमें 35,000 से ज्यादा परिवार तीन दशक से रह रहे थे, उसकी आंख में खटक रही थी। इसीलिए उन्हें हटाया जाना जरूरी था। अदालती मामलों और कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप के बावजूद बुलडोर ने उस बस्ती को उााड़ दिया। सिर्फ 16,000 परिवार डीडीए के सामने अपनी दावेदारी साबित कर पाए। उन्हें बवाना समेत दिल्ली के बाहर कई इलाकों में प्लॉट दिए गए। उपरोक्त किताब में 2577 ऐसे परिवारों के रोगार, जीवनस्तर और वातावरण पर ऐसे विस्थापन के असर का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन की नई बात यह भी कि इसमें प्रशिक्षित शोधकर्ताओं के साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी शोध के लिए प्रशिक्षित किया गया। और इस शोध को एक ‘नारीवादी दृष्टि’ से विकसित किया गया। वे इसके बार में बताते हैं कि कार्यप्रणाली की दृष्टि से नारीवादी शोध, परंपरागत शोध से इस मायने में अलग है कि इसमें खास तौर पर स्त्री-पुरुष और शोधकर्ता- विषय के बीच शक्ित असंतुलन पर ध्यान दिया जाता है। यह मुख्यधारा की शोधप्रणालियों में मौजूद असमानता को चुनौती देने की रणनीति भी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह खास तौर पर महिलाओं और आम तौर पर दूसर उपेक्षित तबकों के दृष्टिकोण और अनुभवों पर ही आधारित होता है। दूसर शब्दों में, आप स्त्रियों का एक वर्ग की तरह अध्ययन नहीं करते बल्कि हर चीज को स्त्रियों के दृष्टिकोण से परखते हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से शोध करने पर परिणाम बहुत अलग निकलते हैं जसा कि इसी शोध से जाहिर है। इस शोध में जो सामने आता है वह उसी का अक्स है जो ‘ग्लोबल’ होने की कोशिश में लगे तमाम भारतीय शहरों की सचाई है। ऐसे में फ्लाईओवर, होटेल, एअरपोर्ट, खेल सुविधाएं, शॉपिंग माल वगैर शहरों के लिए जरूरी मान लिए जाते हैं और गरीबों के लिए सस्ते आवास अमहत्वपूर्ण हो जाते हैं। इनके लिए जो जमीन दी जाती है वह दूरदराज के उपनगरों में या शहर के बार होती है।ड्ढr दिल्ली की कहानी इसलिए विचलित करने वाली है, क्योंकि यहाँ विस्थापित लोगों को नई जगह पर भी रहने की कोई गारंटी नहीं दी गई है। जहाँ वे सालों से रहे हैं वहाँ से उन्हें कई मील दूर खदेड़ दिया गया। फिर उन्हें अपनी दावेदारी साबित करने की पेचीदा और कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, जिसमें रिश्वत देना भी शामिल है, तब जा कर उनहें एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा मिला, ज्यादा से ज्यादा 18 वर्ग मीटर या कभी-कभी तो 12.5 वर्ग मीटर भी। पानी, बिजली, सीवर की सुविधाएं भी कोई ज्यादा बेहतर नहीं हैं। लेकिन सबसे बुरा यह है कि प्लॉट पाँच साल की लीज पर दिए गए और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे उसके बाद भी वहाँ रह सकते हैं।ड्ढr नतीजतन, जो लोग जबर्दस्ती विस्थापित किए गए वे और प्रशासन भी वहाँ की परिस्थितियों को बेहतर बनाने में निवेश करना चाहता है। यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर क्यों डीडीए उन्हें मालिकाना हक देने को तैयार नहीं है जबकि पहले पुनर्वास कॉलोनियों में यह गारंटी थी। चाहे गरीब हो या अमीर, कोई भी नई जगह पर बसने की गारंटी के बिना वहाँ जाना चाहेगा। लेकिन गरीब जाते हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है।ड्ढr महिलाएं खास तौर पर इस विस्थापन की तकलीफ झेलती हैं। मिश्रित आय वर्गो वाले इलाकों में गरीब औरतों को घरों में काम मिल जाता है। भले ही उन्हें कम पैसे मिलें लेकिन वे कई घरों में काम कर लेती हैं और अपने घर की देखभाल करने का वक्त भी निकाल लेती हैं। कई जगहों पर घरलू नौकरानी और मालकिन के बीच काफी सहयोगात्मक रिश्ता होता है जो सिर्फ पैसे के अतिरिक्त भी होता है। लेकिन जब गरीब लोगों को दूसर गरीब और विस्थापित लोगों के इलाके में ही बसाया जाता है तब इस तरह के घरलू काम के मौके नहीं बचते। यही दिक्कत रोदारी पर काम करने वाले पुरुषों की होती है।ड्ढr कई औरतों और मर्दो को अपनी छोटी-मोटी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लंबी दूरी के सफर पर खर्च करने पर मजबूर होना पड़ता है। इस किताब में कई महिलाओं का जिक्र है जिन्हें रो पचास-पचास किलोमीटर का सफर करने के लिए चार घंटे खर्च करने पड़ते हैं। कुछ के लिए इसका मतलब है चार बजे उठ कर घर के सार काम निपटाकर बस से दो घंटे का सफर करके दिल्ली जाना, वहाँ दिन भर काम करना और फिर शाम को वैसे ही घर का काम करने के लिए लौटना।ड्ढr औद्योगिक देश में उपनगरीकरण का अर्थ यह है कि समृद्ध लोग शहर के बाहर बसते हैं और काम के लिए शहर आते हैं। वे लोग इसका अतिरिक्त खर्च उठा सकते हैं। ‘ग्लोबल’ शहर बनाने के लिए गरीबों को कीमत चुकाने के लिए क्यों मजबूर किया जाए। क्या हम एक ‘समावेशक’ शहर नहीं बना सकते जो अपने सार नागरिकों की जरूरतोंड्ढr का ख्याल रखे। आज तो ऐसा लगता है कि दिल्लीड्ढr जसे शहरों के योजनाकार इन दोनों को परस्पर विरोधी मानते हैं।ड्ढr ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: बढ़ते शहरों के उचाड़ते बसेर