अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

खोया हुआ बचपन

टेलीविजन पर छोटे बच्चे इन दिनों बड़े सितार हैं। लेकिन टीवी पर काम करना कोई हंसी खेल नहीं है, उसके ग्लेमर और पैसे के पीछे बीसियों घंटों की मेहनत और खोया हुआ बचपन है। इसलिए यह एक अच्छी बात है कि बाल कल्याण विभाग ने एक विशेषज्ञ समिति बनाई है जो टीवी पर काम करने वाले बच्चों के कामकाज की स्थितियों का अध्ययन करगी और ऐसे नियम बनाने की सिफारिश करगी जिनके जरिए बच्चों के बचपन और उनके स्वाभाविक विकास के अधिकार की रक्षा हो सके। ऐसे नियम बनाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि टीवी पर काम करने या टीवी कार्यक्रमों में भाग लेने का फैसला बच्चे नहीं करते, उनके माँ-बाप करते हैं जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बच्चों को टीवी पर धकेलते हैं। बच्चों के खाने-सोने या काम के घंटे सीमित करने जसे नियम तो जरूरी हैं ही साथ ही भारतीय टीवी या सिनेमा में बच्चों का दूसरी तरह से शोषण भी होता है जो ज्यादा खतरनाक है। अक्सर बच्चों को फिल्मी आइटम नंबरों को गाते या उन पर नाचते हुए टीवी पर देखा जा सकता है या फिल्मों या सीरियलों में उनकी भूमिका ऐसी होती है जिसे किसी भी बच्चे की उम्र के लिहाज से स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। ‘चीनी कम’ जसी एकाध फिल्म में तो बाल कलाकार की भूमिका इतनी आपत्तिजनक थी कि उसे ‘चाइल्ड एब्यूज’ या बाल यौन शोषण के दायर में रखा जा सकता है। स्वाभाविक बचपन का चित्रण कम ही हिन्दी फिल्मों या सीरियलों में मिलता है। यह लाखों दर्शकों तक पहुँचता है और इससे बच्चों और यौन व्यवहार के बार में गलत संकेत जाते हैं। इन तमाम बातों के बार में कानून नहीं बनाए जा सकते लेकिन समाज में इन मुद्दों पर बहस होगी तो फिल्म और टीवी के निर्माताओं पर सांस्कृतिक और सामाजिक दबाव बनेगा। आरुषि कांड पर समाचार चैनलों का रवैया और एक सास बहू सीरियल में इस त्रासदी को भुनाने की कोशिश भी बच्चों के हकों के बार में टीवी की संवदेनहीनता की प्रकट करती है। अपने बच्चों के सम्मान और गरिमा की रक्षा करना समाज की जिम्मेदारी है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: खोया हुआ बचपन