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अमेरिकी राजनीति की इस्लाम ग्रंथि

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा की हिमायत में अमेरिकी मुसलमानों ने बढ़-चढ॥कर हिस्सा लिया। मुसलमान दरअसल इस बार अपने आपको अमेरिका के मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में शामिल करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके वजूद को नकारा न जाए। उनकी मामूली सी हैसियत भी समझी जाय। उनको अवांछित न समझा जाए। शायद इसीलिए मुसलमानों ने अपने आपको ‘ब्लैक वोट’ में खुशी-खुशी तब्दील हो जाने दिया। इसका यह मतलब नही है कि हिलेरी क्िलंटन सिर्फ इसीलिए हारीं। इसका यह भी मतलब नहीं है कि वहां बसे मुसलमान किसी को अमेरिका का राष्ट्रपति बना सकते हैं। लकिन प्राइमरी चुनावों के दौरान बराक ओबामा और हिलेरी क्िलंटन ने जिस तरह मुसलमानों से बचने, उनसे अपने रिश्तों को छुपाने और उनसे दूर-दूर रहन की कोशिश की, उससे ज़ाहिर हो गया कि अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम ग्रंथि की खास जगह मौजूद है। बराक ओबामा को तो सिर्फ इसका सुबूत देना था कि वह मुसलमान नहीं हैं, इसमें वह कामयाब हो गए। जीतन की जरूरी शर्त के तहत इस्रईल की चिलम भरने में भी उन्होन कोई कसर नहीं छोड़ी। अविभाजित यरूशलम, इस्रईल की राजधानी बनेगी, कहकर उन्होंने मुस्लिम विरोधी होन का सर्टिफिकेट भी पा लिया। पर हिलेरी क्िलंटन ने तो सारी हदें पार कर दीं। अमेरिका की फर्स्ट लेडी के अधिकारिक दबदब के साथ संवैधानिक प्रोटोकॉल (निजी पसंद या आस्था नहीं) के दायरे में हिलेरी क्िलंटन के दामन पर लगे ‘मुस्लिम काज़’ को उठान के दाग को मिटाने में उन्होंन कोई कसर नहीं छोड़ी। राष्ट्रपति बिल क्िलंटन जब यासर अराफात से मिलने फिलिस्तीनी प्रशासन के पास गए थे तो हिलेरी अपने शौहर के साथ थीं। परंपरा के तहत यासर अराफात की बीवी को हिलेरी क्िलंटन ने गले लगाकर उनका अभिवादन किया था। अपनी इस भूल के लिए हिलेरी किलंटन ने न्यूयार्क के यहूदियों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। न्यूयार्क की सीनेटर वह शायद इसीलिए बन भी पाई। क्योंकि यहूदियों को इस बात पर बहुत गुस्सा था कि यासर अराफात की बीवी को राष्ट्रध्यक्ष की बीवी का दर्जा क्यों दिया गया । राष्ट्रपति पद के लिए प्राइमरी चुनाव में हिलेरी क्िलंटन ने फिर यहूदियों से माफी मांगी कि उन्होने सर्बिया के मुसलमानों के मानव अधिकारों के हनन के खिलाफ कभी ज़बान खोली थी। हिलेरी ने एक बार तो यहां तक कह दिया कि वह मुसलमानों के लिए किए गए अपन कार्यो पर शर्मिन्दा हैं। कई बार उन्होंने सफाई दी कि उनसे के जा कुछ भी हुआ, वह उनकी सरकारी मजबूरी थी, पर हकीकत में वह ‘मुस्लिम दोस्त’ नहीं है। पर यह बात बड़े सलीके स कही गई और सिर्फ समझने वालों ने ही समझी। हिलेरी क्िलंटन ने अपनी मुस्लिम दुश्मनी का एक और पक्का सुबूत पेश किया। न्यूयार्क के कुछ पाकिस्तानी मुसलमानों ने हिलेरी क्िलंटन को पचास हज़ार डालर का चुनावी चंदा दिया। जैसे ही यह बात यहूदियों को पता चली, उन लोगों न कहा कि यही मुसलमान फिलिस्तीनी आतंकवादियों को पैसा भेजते हैं। यानी यह पचास हज़ार डालर यहूदियों की ‘ब्लड मनी’ है। इसके फौरन बाद हिलेरी ने वह पचास हज़ार डालर मुसलमानों को वापस कर दिये। मुसलमानों के मुँह पर हिलेरी का यह जबर्दस्त तमाचा था, फिर भी हिलेरी हार गईं। दरअसल, इस बार अमेरिकी मुसलमानों के सामने नाइन इलेवन के बाद परवान चढ़ी नफरत से लोहा लेने और अपने किसी एक बेहतर दुश्मन को चुनन का चैलेंज था। बराक ओबामा के खून में मुस्लिम ‘ब्लड सेल्स’ का मौजूद होना काम न आता अगर हिलैरी ने मुसलमानों के खिलाफ इतना ज़बर्दस्त मोर्चा न खोल दिया होता। ‘जेनेटिकली मुस्लिम’ बराक ओबामा ने इस मामले में सतर्कता तो बरती ही, अपने मुस्लिम विरोध के टेम्प्रेचर को वह कंट्रोल भी करते रहे।ड्ढr दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी के लिए होने वाले इस चुनाव में यहूदियों को खुश करन की जिस तरह की कोशिश हुई, उससे फिर साबित हो गया कि अमेरिकी राजनीति में धर्म अभी भी मायने रखता है। अमेरिका में उतने ही यहूदी बसते हैं जितने इस्रईल में, करीब सवा पाँच करोड़। दूसरे लफज़ों में कहें तो एक पूरा इस्रईल, अमेरिका अपने अंदर समाए हुए है। इस तरह से देखें तो दुनिया में दो इस्रईल हैं। पर इसे एक अजीबो-गरीब इत्तेफाक ही कहा जाएगा कि दोनां को ही पूरी दुनिया ने अभी तक तस्लीम नहीं किया है। न तो फिलिस्तीन को और न इस्स्रईल को। इसे भी इत्तेफाक ही कहा जाएगा कि जैसे बुश प्रशासन का ध्येय रहा कि फिलिस्तीन एक राज्य है, या उसे राष्ट्र का दर्जा मिलेगा या दिया जाएगा। इसी तरह बिल क्िलंटन भी मानते रहे थे कि फिलिस्तीन नाम का राज्य वजूद में है या होगा। इसी सिद्धान्तत: सहमति, की बिना पर हिलेरी किलंटन ने यासर अराफात की बीवी का अभिवादन किया था। अमेरिका में 10 के बाद से यहूदियों की आमद में जबर्दस्त इज़ाफा हुआ। जब वहां जैकसन वैनियक कानून बन गया। अब वहाँ न्यूयार्क सिटी, हयूस्टन, डलास, सैन फ्रांसिस्कों, बाल्टीमोर, शिकागो, मियामी, लॉस एंजेलिस, सेंट लुईस और लॉस वेगास यहूदियों के केन्द्र बन चुके हैं। अंतरधार्मिक शादी या रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को यहूदी परवरिश देन के लिए बोस्टन में मिशनरी चल रही है। यहूदियों की इबादतगाह ‘सिनेगॉग’ में 1में मेम्बरशिप ग्यारह फीसदी से बढ॥कर सन् 2000 में 21 फीसदी हो गई है। अपनी कुल आबादी मेंीसदी यहूदी गोरी चमड़ी वाले हैं। एक-एक फीसदी एशियाई और अफ्रीकी मूल के है, बाकी हिस्पैनी हैं। अमेरिका के 80 फीसदी यहूदी मज़हबी सोच के हैं। अमेरिका में यहूदी और मुसलमान, दोनो ही एक दूसरे की आबादी के आकड़ों को गलत और मनगढंत बताते रहते हैं। इस मामले में अमेरिकी सरकार खामोश रही है।ड्ढr यहूदियों की अमेरिका पर जबर्दस्त पकड़ हो गई है। इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 1तक अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी में एक-आध यहूदी प्रोफेसर था। अब लगभग सभी प्रतिष्ठित संस्थानों में बीस प्रतिशत प्रोफेसर यहूदी मिलेंगे। वहां मुसलमान यहूदियों के पांसग बराबर भी नहीं है। अमेरिका की साढ़े तीस करोड़ की आबादी में मुसलमान एक करोड़ भी नहीं, सत्तर अस्सी लाख ही है। इनमें भी 33 प्रतिशत भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हैं, 30 फीसदी अफ्रीकी और 25 प्रतिशत अरब। यानी तीन सयताओं वाले अलग-अलग विचारों के मुसलमान। अमेरिका में कुल 120मस्जिदें हैं। इनमें आने वाले मुसलमान अमेरिका के मेनस्ट्रीम के यूएस सिटीज़न नहीं, अमेरिकी लेबर फोर्स का बड़ा हिस्सा जरूर है। जिनकी बहुत ज्यादा अहमियत या हैसियत नहीं होती। ज़ाहिर है कि डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन उन्हें यहूदियों की हिमायत चाहिए। यहूदियों का खुश रहना जरूरी है न कि मुसलमानों का।ड्ढr

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