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एक दर्पण की रजत जयंती

देश, धर्म, जातीयता की सीमाओं से परे दुनिया के लोगों को एक साथ जोड़ने का सपना बहुत पुराना है। 19वीं सदी में तो इसने बाकायदा एक राजनीतिक विचारधारा की शक्ल लेनी शुरू कर दी थी। कुछ लोगों को सिर्फ उम्मीद ही नहीं, पूरा विश्वास था कि पूरी दुनिया के मजदूर एक हो गए, तो सब कुछ बदल जाएगा। वे ये भी मानते थे कि इसके अलावा और कुछ हो भी नहीं सकता। इन विचारधाराओं से अलग भी बहुत से लोग विश्व बंधुत्व की बात करते थे। लेकिन 20वीं सदी के पूर्वार्ध में दो विश्व युद्ध लड़ने के बाद जो दुनिया सामने आई, वह पहले से ज्यादा कट्टर और खानो में बंटी थी। पूरी दुनिया के मजदूरों में एकता कायम करने की कसमें खाने वाले जहां सफल हुए, वहां उन्होंने बाकी दुनिया के लोगों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए। वीजा और पासपोर्ट जैसी व्यवस्थाएं इसी दौर में शुरू हुईं, इसके पहले तक दुनिया के लोग कहीं भी आ-जा सकते थे। एक-दूसरे से मिल सकते थे। फिर इसके बाद वे विचारधाराएं आईं, जो कहती थीं कि बाजार और कारोबार के जरिये दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ रही हैं, जो देर-सवेर लोगों को भी जोड़ेंगी। लेकिन जल्द ही यह भी साफ हो गया कि दुनिया के लोगों को जोड़ना इतना आसान भी नहीं है और फिर अर्थव्यवस्थाओं के दरवाजे खोलने के तर्कों के पीछे यह मकसद भी नहीं है।

लेकिन 20वीं सदी के अंत में कुछ ऐसा हुआ, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। जिस काम को करने में विचारधाराएं, राजनीति और अर्थशास्त्र सब नाकाम रहे, उसे तकनीक ने कर दिखाया। इंटरनेट ने पूरी दुनिया के लोगों को एक ऐसी व्यवस्था दी, जिससे सब लोग एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। कई देशों की तानाशाही ने इसके रास्ते को रोकने की कोशिश की (कई जगह बाधाएं बनाने की कोशिशें अभी तक जारी हैं), लेकिन वे एक हद के आगे तकनीक के आगे बेबस हो गईं। भारत जैसे देश में नौकरशाही के टालू रवैये के बावजूद देर-सवेर इंटरनेट ने यहां पांव पसार ही लिए। दुनिया भर के स्थापित उद्यमियों और औद्योगिक घरानों ने इसकी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की, लेकिन एक हद के बाद वे नाकाम रहे। इंटरनेट ने बहुत-सी दूसरी पुरानी व्यवस्थाओं की तरह इन उद्यमियों को भी नकार दिया। नए दौर के इस माध्यम ने खुद अपने उद्यमी पैदा किए। महज 12 साल पहले बनी गूगल, बिना कोई उत्पादन किए और बिना कोई सामान बेचे अब 60 अरब डॉलर का कारोबार करने वाली कंपनी बन गई है। दस साल के भीतर ही फेसबुक की संपत्ति 18 अरब डॉलर से भी ऊपर पहुंच चुकी है। ट्विटर को तो अभी आठ साल भी पूरे नहीं हुए और उसका बाजार पूंजीकरण 32 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। इंटरनेट के इन नए अमीरों के उदय की व्याख्या आप पूंजीवाद, मुनाफे या सरप्लस वैल्यू के किसी परंपरागत किताबी सिद्धांत से नहीं कर सकते।

इंटरनेट की इस व्यवस्था की खासियत यह है कि कई मामलों में यह सरकारों और नीतियों की मोहताज नहीं है। अपने विकास और विस्तार के बहुत सारे रास्ते यह खुद तैयार कर लेती है। अभी कुछ दिन पहले तक कहा जाता था कि भारत में बहुत ज्यादा लोगों के पास कंप्यूटर नहीं है, बिजली हर जगह पहुंचती नहीं है, इसलिए इंटरनेट एक खास वर्ग तक ही पहुंच पाएगा। लेकिन अब इंटरनेट मोबाइल फोन के जरिये पहले से कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंच रहा है। बेशक, अब भी यह सब लोगों तक नहीं पहुंच रहा। आगे कौन से नए रास्ते खुलेंगे, हमें नहीं पता, पर फिलहाल यह किसी की प्राथमिकता भी नहीं है। आम चुनाव के लिए कई घोषणापत्र आ चुके हैं, कई आने वाले हैं, शायद ही डिजिटल डिवाइड को खत्म करने के संकल्प को कहीं जगह मिल सकेगी। मुफ्त में लैपटॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन बांटने के वादे करने वाले दल भी यह नहीं कहते कि वे इंटरनेट को हर किसी तक पहुंचाएंगे। गरीबी की रेखा और शिक्षा के अधिकार से जूझ रहे समाज के लिए यह शायद इतना आसान भी नहीं है।

लेकिन सिर्फ इतनी-सी समस्या के अलावा इंटरनेट पर सब कुछ अच्छा ही हो, ऐसा नहीं है। समस्याएं बहुत सारी हैं। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट पर पोस्ट के कारण उत्तर प्रदेश से दंगा होने की कुछ घटनाएं घट जाती हैं। ट्विटर की कुछ टिप्पणियों के कारण पूवरेत्तर भारत के लोग बड़े पैमाने पर दक्षिण भारत से पलायन को मजबूर हो जाते हैं। पिछले दिनों जब फेसबुक की दसवीं वर्षगांठ मनाई गई, तो एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा कि इसे कट्टरपंथियों ने अपना मैदान बना लिया है और जब वे एक नेता विशेष के खिलाफ लिखते हैं, तो वे सब न सिर्फ उनके पीछे पड़ जाते हैं, बल्कि गाली-गलौज के स्तर पर उतर आते हैं। फिर, इंटरनेट के जरिये ठगी की खबरें आए दिन मिलती रहती हैं। दुनिया भर में कई जगहों से यह शिकायत भी आती रहती है कि प्रतिबंधित मादक पदार्थो का कारोबार इंटरनेट के जरिये हो रहा है।
यहां पर हमें फिर लौटना होगा 19वीं सदी के उन सपनों की ओर, जो पूरी दुनिया के लोगों को जोड़ने की बात करते थे। उस समय इन सपनों के साथ ही कुछ मूल्यों पर भी जोर दिया जाता था। मसलन एक मूल्य था सहिष्णुता का। सपने देखने वालों को पता था कि सहिष्णु हुए बिना अगर दुनिया के तरह-तरह की सोच वाले समाज और तरह-तरह की मानसिकता वाले लोग एक-दूसरे से जुड़ गए, तो क्या खतरे हो सकते हैं। इंटरनेट ने उस वक्त पूरी दुनिया के लोगों को जोड़ा है, जब सामाजिक बदलाव और समाज-सुधार की बात करने वाली धाराएं सूख गई हैं। दरअसल, इंटरनेट एक और कारण है, जिसकी वजह से हमें सहिष्णुता के विस्तार और कट्टरता के नाश वाली धाराओं को फिर से जीवित करना चाहिए। वरना तहरीर चौक और पश्चिम उत्तर प्रदेश के दंगों जैसी खबरें हमें एक साथ हर कुछ समय बाद मिलती रहेंगी। इंटरनेट पर होने वाली ठगी और अन्य अपराधों का सच भी यही है। दुनिया जुड़ चुकी है, इसलिए एक देश में बैठा कोई ठग दूसरे देश के किसी नागरिक को कभी भी ठग सकता है। लेकिन वे तंत्र आपस में नहीं जुड़े हैं, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे ठगों की धरपकड़ करके लोगों को उनसे निजात दिलाएंगे।

पिछले 25 साल में इंटरनेट एक निरपेक्ष माध्यम या इन्फ्रास्ट्रक्चर के रूप में विकसित हुआ और पूरी दुनिया में फैला है। दुनिया के पूरे समाज ने इसे अपनाया है- सदिच्छा वाले लोगों ने भी, दुर्भावना वाले लोगों ने भी। एक तरह से यह हमारी ही अच्छाइयों और बुराइयों का दर्पण है। इस दर्पण को बदलने या सुधारने से कुछ नहीं होगा, बदलना और सुधारना तो हमें अपने समाज को ही पड़ेगा।

 

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