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छोटे दलों से गठजोड़ करने की मजबूरी

दो बातें विरोधाभासी हो रही हैं। बीजेपी का दावा है कि देश में बह रही मोदी की हवा चुनाव के समय सुनामी में बदल जाएगी। लेकिन मोदी की शह पर बिहार में 40 में से 15 सीटें बांटी जा रही हैं। पासवान को सात, उपेंद्र कुशवाहा को तीन और पांच सीटें जदयू या आरजेडी के बागियों को देने की पूरी तैयारी है। महाराष्ट्र में तो राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ अलिखित गठबंधन कर लिया गया है। यह शिव सेना की नाराजगी को समझते हुए भी किया गया है। बिहार और यूपी में पूछा जा रहा है कि जो राज ठाकरे मुंबई में बिहार और यूपी के लोगों को वहां से भगाने की बात करते हैं, उनकी ही पार्टी से समझौता क्यों?

लेकिन मोदी को इसकी चिंता नहीं लगती। वह छोटे दलों से समझौता कर इसकी भरपायी करने के फेर में दिखते हैं। यूपी में अपना दल जैसी छोटी पार्टी के साथ भी बीजेपी समझौता कर रही है। पीए संगमा की पार्टी भी सात सीटों के बदले बीजेपी का साथ देने को तैयार है। हरियाणा में आईएनएलडी से समझौते की बात भी सुनाई दे रही है। हालांकि, इसके सबसे बड़े दो नेता ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला टीचर भर्ती घोटाले में जेल की सजा काट रहे हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके और भ्रष्टाचार के मामले में जेल की हवा खा चुके येदियुरप्पा को बीजेपी टिकट दे ही चुकी है। खनन माफिया कहलाने वाले बेल्लारी के श्रीरामुलू भी साथ आ गए होते, अगर सुषमा स्वराज ने विरोध नहीं किया होता। अगर सचमुच नरेंद्र मोदी की हवा चल रही है, तो फिर यह सब क्यों? मोदी को भी पता है कि उम्मीदवारों के चयन के बाद जमीनी हकीकत में कुछ बदलाव आता है। लोग भले ही मोदी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हों, लेकिन अपने इलाके से खड़े होने वाले उम्मीदवार को देखकर भी वे फैसला करते हैं।

अभी तक यही लग रहा है कि जहां सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला है, वहां-वहां बीजेपी थोक के भाव में सीट निकलाने की क्षमता रखती है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ ऐसे ही कुछ राज्य हैं। लेकिन जहां सामने गैर-कांग्रेसी पार्टी है, वहां वहां उन्हें मुकाबला दिख रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव ने यह तो साबित कर दिया था। नरेंद्र मोदी जानते हैं कि सपा, बसपा, ममता, जयललिता, पटनायक, लालू, जगनमोहन रेड्डी से भिड़ना और वहां से सीटें निकाल लेना आसान नहीं है। अभी तक मोदी के साथ एक भी ऐसी पार्टी नहीं जुड़ी है, जो पांच से ज्यादा सीटें निकालने की क्षमता रखती हो। पासवान हो या कुशवाहा या फिर संभावित चौटाला या फिर संभावित एजीपी। मोदी को ममता, जयललिता, मायावती, जगनमोहन रेड्डी, नीवन पटनायक जैसे नेता चाहिए, जो एक साथ दस से बीस सीटें जीत सकते हैं। लेकिन इन नेताओं में से फिलहाल तो कोई बीजेपी के साथ आता दिख नहीं रहा। इसीलिए अब छोटे दलों का ही भरोसा बचा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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  • Web Title:छोटे दलों से गठजोड़ करने की मजबूरी