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बुरा जो देखन मैं चला

अक्सर हम दूसरों के दोष, ऐब निकालते रहते हैं- वह स्वार्थी है, निकम्मा है, क्रोधी है, लालची है। कई बार या अक्सर ही इसमें वे दोष भी होते हैं, जो खुद हमारे अंदर भी गहराई तक पैठ बनाए हुए हैं। दोषों को अपने भीतर न देखकर बाकी दुनिया भर में देखना सबसे बड़ा दोष है। और अक्सर हम इसे दोष मानते नहीं। इन सबका नतीजा होता है- कटुता, दुर्भाव, विभाजन, कलह, द्वेष, असहयोग, वगैरह, जो हमारे रोजमर्रा के तनाव को बढ़ाता है।

पाप-पुण्य की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ‘दूसरों के प्रति उपकार करना ही पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना ही पाप है।’ आत्मन: प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत - जो अपने प्रतिकूल हो, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ कभी नहीं करना चाहिए। दिक्कत यह है कि हम धर्म के रूप को कभी नहीं मानते।
दूसरों से प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, सहयोग और सहानुभूति की अपेक्षा सभी रखते हैं। पर जब हम व्यावहारिक रूप में दूसरों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं करते, तो इसे बुरा विचार, असभ्य माना जाता है। अपने तौर-तरीकों को ही श्रेष्ठ मानना और अपनी इच्छाओं को उचित-अनुचित किसी भी तरह पूरी करने की भावना कई समस्याओं को जन्म देती है, जबकि हमारे यहां हमेशा से ही यह माना गया है कि परोपकार पुण्य है, क्योंकि इसका आधार सद्भावना होता है और अपकार पाप है। विचारों के अनुसार ही चेष्टाएं जागृत होती हैं। सत्कर्मों के विस्तार से आत्मा विकसित होती है; आत्म-विकास से सुख की रसानुभूति होती है। अध्यात्म की पहली शिक्षा यह ही है कि हम निरंतर मंगलमय कामनाएं करें और सदाचारी बनें। यह तभी संभव है, जब सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिले। अगर हमारा मन शुभ संकल्प वाला होगा, तो हम दूसरों में भी अच्छाइयों को खोजेंगे। सिर्फ बुराइयों की खोज करते हुए हम किसी सार्थक मंजिल तक नहीं पहुंच सकते।

 

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