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माओवादियों के निशाने पर

छत्तीसगढ़ में माओवादियों के हमले में सुरक्षा बलों के जवानों का मारा जाना दुखद है। जो खबरें मिल रही हैं, उनसे यह पता चलता है कि माओवादियों ने हमले में अपनी पुरानी रणनीति ही अपनाई थी। उन्होंने सड़क रोककर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और पुलिस की टुकड़ी को घेर लिया और विस्फोटकों और अंधाधुंध फायरिंग के जरिये कई जवानों को मार डाला। यह जगह भी दक्षिण बस्तर के उसी इलाके में है, जहां अप्रैल 2010 में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या माओवादियों ने की थी। इसी इलाके में विधानसभा चुनावों के पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं पर भी जानलेवा हमला नक्सलियों ने किया था, जिसमें कई नेता मारे गए थे। पिछले महीने ही पांच पुलिस जवान भी माओवादी हमले में मारे जा चुके हैं। यह इलाका महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की सीमा पर है, इसलिए माओवादियों के लिए यह आसान होता है कि वारदात करके दूसरे राज्यों में भाग जाएं। चारो तरफ यह सारा इलाका घने जंगलों से घिरा है, इसलिए भी माओवादी यहां सक्रिय हो पाते हैं। लेकिन इस बार वारदात वहां के मुख्य राजमार्ग पर हुई है। आमतौर पर यह माना जाता है कि अंदरूनी जंगलों में माओवादियों का दबदबा होता है, लेकिन राजमार्ग के आसपास के इलाके में सरकार का नियंत्रण ज्यादा होता है, इसलिए उसे सुरक्षित माना जाता है। इस जगह वारदात करके माओवादियों ने सरकार को बड़ी चुनौती दी है।

इस घटना से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि माओवादियों का प्रभाव बढ़ रहा है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि उनकी ओर से ऐसे हमलों की आशंका बढ़ी है। चुनावी माहौल में यह खतरा ज्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि जन-संपर्क के लिए राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर सुरक्षा छोड़कर दूर-दराज के गांवों में जाने का जोखिम उठाते हैं। माओवादियों को चुनाव के दिनों में एक भी ऐसी वारदात से इतना प्रचार मिलता है और उससे इतनी दहशत फैल जाती है कि इससे उनका मकसद हल हो जाता है। इसलिए जब उनका प्रभाव कम होने लगता है, तब इस बात की आशंका ज्यादा होती है कि वे जोखिम लेकर ज्यादा सनसनीखेज वारदात करने की कोशिश करें। फिलहाल ऐसी ही स्थिति है, जब उनकी ताकत घट रही है और आदिवासियों पर उनका प्रभाव घट रहा है, इसलिए ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। विधानसभा चुनावों के दौरान इतनी बड़ी वारदात करने के बावजूद छत्तीसगढ़ की जनता ने अच्छी वोटिंग करके लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपना विश्वास जताया। लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे ठंडे पड़ जाएंगे, बल्कि वे ज्यादा क्रूरता के साथ हमले कर सकते हैं। सरकार और सुरक्षा बलों को इसलिए भी अब ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत है।

यह देखा गया है कि जब भी माओवादियों ने वारदात की है, उसमें कहीं न कहीं सुरक्षा बलों की सतर्कता में कुछ ढील या असावधानी रही है। नियमित रूप से एक किस्म की सुरक्षा कवायद पर अमल करते-करते उसमें धीरे-धीरे औपचारिकता निभाने का तत्व आने लगता है, और असावधानी हो जाती है। खास तौर पर जब ऐसा महसूस हो कि दुश्मन अब उतना ताकतवर नहीं रहा। छत्तीसगढ़ में मौजूद सुरक्षा बलों को अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा चौकन्ना रहने की जरूरत है। पिछले सालों में माओवादियों की रणनीति का बारीकी से अध्ययन किया गया है और उनके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। ऐसे में, उनके पुराने किस्म के व्यूह में फंसकर अगर कीमती जानें जाती हैं, तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि हमने पिछली बातों से कुछ भी नहीं सीखा है।

 

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