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चुनावी चंदे का चक्कर

भारत हो या अन्य लोकतांत्रिक देश दल बिना चंदे के चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकते। और अगर चंदे में पारदर्शिता न हो तो यह भ्रष्टाचार की जड़ बन जाता है। देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टियां चंदे के हिसाब-किताब में पारदर्शिता नहीं रखती हैं। कुछ ऐसे भी दल हैं, जो बिना चुनाव लड़े चंदा लेते हैं और उसका हिसाब भी नहीं देते। हालांकि अमेरिका में पारदर्शिता बरती जाती है, पर 2012 के चुनाव में वहां मीडिया और विश्लेषकों ने शीर्षक लगाया था कि यह है हमारा भ्रष्टतम चुनाव। आज जानते हैं चंदे का चक्कर क्या है :

15 वर्षों से जारी है पारदर्शिता की कोशिश
चुनाव आयोग 15 वर्षों से राजनीतिक पार्टियों के हिसाब-किताब में पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सियासी पार्टियां कोई न कोई रास्ता निकाल कर अपनी आमदनी और खर्च का ब्योरा देने से बचती रही हैं। आयोग ने पिछले साल सभी पार्टियों को चिट्ठी लिख कर चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए 10 सुझाव दिए थे, लेकिन पार्टियों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। आयोग ने राजनीतिक पार्टियों के हिसाब-किताब में पारदर्शिता की शुरुआत 15 जुलाई 1998 में की थी, लेकिन अब तक किसी पार्टी ने न तो पारदर्शिता बरती है और न ही आय-व्यय का सही हिसाब रखा है।

मोटा-मोटा हिसाब देती हैं पार्टियां
सभी पार्टियां आमदनी और खर्च का हिसाब आयकर विभाग को बताती हैं, पर वह बहुत मोटा होता है। क्योंकि, मौजूदा नियमों के मुताबिक, 20 हजार रुपये से कम के राजनीतिक चंदे का हिसाब बताना जरूरी नहीं है। कई सियासी दल इसका फायदा उठा कर ज्यादातर राशि को छोटे-छोटे हिस्सों में दर्ज करते हैं। एक और बात चुनाव के दौरान उम्मीदवार के लिए तो खर्च की सीमा तय है, पर पार्टियों के लिए नहीं है। ऐसे में काफी चुनावी खर्च पार्टियों के खाते में डाल दिया जाता है।

379 करोड़ रुपये मिले औद्योगिक घरानों से
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक देश के औद्योगिक घरानों ने राजनीतिक पार्टियों को 379 करोड़ रुपये चंदा दिया। इन कंपनियों से मिला चंदा सियासी दलों को ज्ञात सभी स्त्रोतों से प्राप्त चंदे का 87 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा को 1,334 कंपनियों से 192.47 करोड़ और कांग्रेस को 418 कंपनियों से 172.25 करोड़ रुपये चंदे में मिले।

चंदा देने के लिए औद्योगिक घरानों ने बनाए ट्रस्ट
राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए अंबानी, मित्तल सहित पांच औद्योगिक घरानों ने ट्रस्ट बनाए हैं। इसके अलावा दो दर्जन से अधिक कारोबारी समूह इस तरह की योजना बना रहे हैं। ये सभी ट्रस्ट नए नियमों के तहत पंजीकृत किए जा रहे हैं। नए नियमों के मुताबिक चुनावी चंदे के लिए ट्रस्ट का गठन करना जरूरी है। इसमें राजनीतिक पार्टियों को दिए गए चंदे पर कर में छूट भी मिलती है।

चुनावी चंदा पारदर्शिता
आम आदमी पार्टी चुनावी चंदे की पारदर्शिता को बेहद अहम मानती है। इसके लिए पार्टी विशेष रूप से चंदा देने वालों के बारे में सूचना अपनी वेबसाइट पर देती है। पार्टी चंदे के रूप में दिए गए हर रुपये का हिसाब वेबसाइट पर अपडेट करती है। ‘आप’ का कहना है वह किसी भी तरह का ढका छिपा चंदा नहीं लेते हैं। भाकपा-माकपा ने भी अपने सारे लेन-देन का ब्योरा वेबसाइट पर डालना शुरू कर एक सार्थक पहल की है। जो राजनीतिक दल अपनी आय-व्यय का हिसाब चुनाव आयोग को सौंपते हैं, उनकी कोशिश आयकर में राहत लेने की होती है। चुनाव आयोग के पास उनके हिसाब-किताब के मूल्यांकन का कोई अधिकार नहीं है।

चुनाव न लड़ने वाले दल भी ले जाते हैं चंदा
सूचना अधिकार (आरटीआई) के जरिये मिले एक जवाब के मुताबिक भारत में सैकड़ों ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो बिना चुनाव लड़े भारी-भरकम चंदा लेते हैं और इसकी जानकारी भी नहीं देते। चुनाव आयोग के पास 1600 के आसपास राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं, जिनमें से अधिकतर चुनाव नहीं लड़ती हैं। इन पार्टियों ने छोटे व्यापारियों से 11,000 से लेकर बड़े व्यापारियों से 5 करोड़ रुपये तक का चंदा लिया है।

40 देशों में दल करते हैं आय का खुलासा
कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) की पिछले साल जारी रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 40 देशों में सियासी दलों को कानून के तहत अपनी आय के स्नोत, संपत्तियों और देनदारियों का खुलासा करना होता है।

नेपाल : राजनीतिक दल कानून, 2002 के तहत सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने वार्षिक आय-व्यय का ब्योरा प्रकाशित करना होता है। 25 हजार नेपाली रुपये से अधिक दान देने वाले लोगों के नाम बताने होते हैं। यह सभी राजनीतिक पार्टियां सूचना अधिकार के तहत आती हैं।

जर्मनी: राजनीतिक पार्टी कानून, 1967 के तहत इस देश में हर राजनीतिक पार्टी को अपना आय स्त्रोत सार्वजनिक करना होता है। जो पार्टियां कानूनी तौर पर दान लेती हैं उन्हें हर साल खातों का विवरण जर्मन पार्लियामेंट में देना होता है। इन विवरणों का प्रकाशन किया जाता है साथ ही ये विवरण पार्लियामेंट की वेबसाइट पर भी उपलब्ध होते हैं।

स्वीडन: राजनीतिक पार्टियों के संयुक्त समझौते के मुताबिक हर पार्टी को दान में मिली राशि और दानदाता का नाम सार्वजनिक करना होता है। व्यक्तिगत रूप से प्राप्त दान के मामले में कुल दानदाताओं की संख्या और उनसे प्राप्त कुल राशि के बारे में बताना होता है। यहां पर कोई भी व्यक्ति पार्टियों के खातों की जांच कर सकता है।

तुर्की: यहां की कुछ राजनीतिक पार्टियां खुद ही अपने आय-व्यय के आंकड़े जारी करती हैं। ये आंकड़े पार्टियों की वेबसाइट पर उपलब्ध होते हैं, जिन्हें कोई भी देख सकता है। यहां पार्टियों को आय-व्यय का ब्योरा देने की कानूनी बाध्यता नहीं है।

इन देशों की पार्टियां भी देती हैं हिसाब
आर्मेनिया, ऑस्ट्रिया, भूटान, ब्राजील, बुल्गारिया, फ्रांस, इटली, जापान, फ्रांस, घाना, यूनान, हंगरी, इटली, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पोलैंड, रोमानिया, स्लोवानिया, सूरीनाम, ताजिकिस्तान, यूक्रेन, उज्बेकिस्तान, अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका।

चंदे की सीमा पर नहीं है रोक
अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सहित दुनिया के कई देशों में राजनीतिक चंदे की सीमा पर कोई रोक नहीं है, लेकिन अज्ञात स्त्रोत से कोई चंदा नहीं लिया जाता।

चुनाव आयोग के कुछ सुझाव
- राजनीतिक पार्टी का खजांची भारत के चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थान द्वारा निर्धारित मानकों के आधार पर सभी वित्त संबंधी गतिविधियों और खातों का संचालन करे।
- राजनीतिक दल चंदे को उचित समय के अंदर मान्यता प्राप्त बैंक में जमा करें।
- चुनाव से जुड़े खर्च भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मान्य माध्यमों के जरिये ही किया जाए।
- चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को आवंटित राशि के विवरण का प्रमाणपत्र लिया जाए।
- राजनीतिक दल अपने खातों की ऑडिटिंग करा कर उसकी एक प्रति चुनाव आयोग को सौंपे।
(ये सुझाव चुनाव आयोग ने वर्ष 2013 में दिए थे)

राजनीतिक दलों को कुल 4,895 करोड़ रुपये मिला चंदा
पिछले साल आई एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों का 75 फीसदी चंदा अज्ञात स्त्रोत से आता है। 2004-05 से 2011-12 के दौरान राजनीतिक पार्टियों को 4,895 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इसमें से 3,674 करोड़ रुपये का स्त्रोत ज्ञात नहीं है। जिन पार्टियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, उनमें कांग्रेस, भाजपा, भाकपा, माकपा, बसपा और एनसीपी शामिल हैं।

2012 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मिला चंदा
बराक ओबामा यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया 12,12,245
 माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन 8,14,645
 गूगल  8,01,770
 अमेरिकी सरकार 7,28,647
 हार्वर्ड यूनिवर्सिटी 6,68,368
मिट रोमनी गोल्डमैन सैस  10,33,204
 बैंक ऑफ अमेरिका 10,13,402
 मॉर्गन स्टैनली  9,11,305
 जेपी मॉर्गन चैस एंड कं. 8,34,096
 वेल्स फारगो  6,77,076
  (स्त्रोत: ओपन सीक्रेट, नोट : चंदे की राशि अमेरिकी डॉलर में)

 

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