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पूवोत्तर पहुंची तेलंगाना की आंच

पूवोत्तर पहुंची तेलंगाना की आंच

राष्ट्रीय पार्टियों की सहमति की बदौलत तेलंगाना के गठन को संसद से मंजूरी मिल गई। लेकिन संसद से पारित इस विधेयक ने चुनाव से ऐन पहले पूवोत्तर पहुंची तेलंगाना की आंच में इन सियासी पार्टियों को असहज कर दिया है।
 
पूवोत्तर पहुंची तेलंगाना की आंच में कई नए राज्य गठित करने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। इनमें से बोडोलैंड की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन सबसे लंबा और हिंसक है। उम्मीद के अनुरूप तेलंगाना के गठन का असर इस आंदोलन पर भी पड़ा है। इसका खामियाजा पूवोत्तर पहुंची तेलंगाना की आंचर की कुल 25 लोकसभा सीटों में कम से कम आठ पर पड़ना तय है। केंद्र भी इस खतरे को महसूस कर रहा है। इसलिए सरकार ने चुनाव से ऐन पहले बोडोलैंड गठित करने की मांग पर विचार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित कर दी है।

इस कदम का बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने स्वागत किया है। वह राज्य में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चला रही है। लेकिन बाकियों का मानना है कि यह और समय जाया करने की महज चाल भर है। मौजूदा समय में बोडो आबादी वाले उत्तर-मध्य और पश्चिम असम के चार जिलों को मिलाकर एक परिषद का गठन किया गया है।

समिति का विरोध भी शुरू : पिछले 40 साल से बोडोलैंड राज्य का गठन करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रही द ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) सरकार के इस कदम को महज और समय लेने की चाल मान रही है। इसके खिलाफ उसने पूरे राज्य में 100 से 1000 घंटे की बंद बुलाने की घोषणा की है। इसकी शुरुआत आने वाले दिनों में होगी।

भाजपा और कांग्रेस का धर्मसंकट : प्रस्तावित बोडोलैंड में असम के कोकराझार, बारपेटा का बड़ा इलाका और मंगलदोइ विधानसभा क्षेत्र आता है। इन सीटों का कांग्रेस और भाजपा प्रतिनिधित्व करती आई हैं। नए राज्य विरोध करने पर उन्हें बोडो लोगों का विरोध का सामना करना पड़ेगा। वहीं समर्थन करने पर अन्य जातियां मसलन कोच-राजबोंगशी नाराज हो जाएंगी।

चुनाव से पहले नए राज्यों की मांग ने जोर पकड़ा
पूवरेत्तर में कम से कम सात नए राज्य गठित करने की मांग को लेकर वहां की जनता कई सालों से आंदोलन कर रही है। ये हैं-

बोडोलैंड (असम)

बोडो जनजाति के लिए अलग राज्य गठित करने की मांग करीब चार दशक पुरानी है। फिलहाल चार बोडो बहुल जिलों का प्रशासन एक स्वायत्त परिषद देखती है। लेकिन उनकी मांग अन्य बोडो इलाकों को मिलाकर नया राज्य गठित करने की है।

कामतापुर (असम और पश्चिम)
मुख्य रूप से कोच-राजबोंगशी  समुदाय की ओर से प्रस्तावित मानचित्र में बोडोलैंड का लगभग पूरा इलाका, गोरखालैंड का मैदानी इलाका और बंगाल के उत्तरी जिलों को शामिल किया गया है। यह जाति अनुसूचित जनजाति का दर्जा भी मांग रही है।

दीमा-हसाओ (असम) :
दीमसा जनजाति को केंद्रित कर राज्य की मांग की जा रही है। राज्य के प्रस्तावित मानचित्र में हिल काउंसिल द्वारा नियंत्रित इलाके शामिल हैं।

कूकीलैंड (मणिपुर)
कूकी जनजाति के लोगों को केंद्रित कर की जा रही नए राज्य की मांग में मणिपुर के चूड़ा चांदपुर, चंदेल और अन्य पहाड़ी जिलों को शामिल करने का है प्रस्ताव।

गारोलैंड (मेघालय)
गारो जनजाति बहुल मेघालय के पांच पश्चिमी जिलों को अलग कर नया राज्य बनाने की मांग की जा रही है।

फ्रंटियर नगालैंड (नगालैंड)
इस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गेनाइजेशन ने मांग की है कि नगालैंड के चार जिलों तुएनसांग, मोन किपहीर,लॉन्गलेंग को मिलाकार नया राज्य बने।

कार्बी आंगलॉन्ग (असम)
इनकी भी मांग कार्बी जनजाति बहुल वाले इलाके के दो जिलों को मिलाकर अलग राज्य का दर्जा देने की है। फिलहाल इस क्षेत्र का प्रशासन स्वायत्त परिषद के हाथों में है।

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