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अवसरवादी राजनीति का तकाजा है अजित-अमर का साथ

लोकसभा चुनाव से पहले सियासत के दो चर्चित चेहरों अमर सिंह और जया प्रदा का राष्ट्रीय लोकदल में शामिल होना उत्तर प्रदेश में क्या सियासी गुल खिलाएगा ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अमर सिंह और अजित दोनों ही सियासत के ऐसे मंजे हुए खिलाड़ी हैं, जो अपने नफा और नुकसान का दूर-दूर तक आंकलन करने के बाद ही कदम उठाने के लिए पहचाने जाते हैं।

अजित शुरुआत से ही अवसरवाद की राजनीति के कारण सुर्खियों में रहे हैं। कभी वह भाजपा से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव की ओर मुंह ताकते हैं और जब उन्हें लगता है कि उनका सियासी भविष्य कांग्रेस के साथ महफूज रहेगा तो वह उसके साथ खड़े होने से भी परहेज नहीं करते।

दूसरी ओर, अमर सिंह के लिए भी अपना सियासी वजूद बचाने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले नया दल तलाशना जरूरी हो गया था, ऐसे में वक्त की नजाकत और अपने मिजाज को समझते हुए उन्हें भी अजित का साथ सबसे बेहतर लगा।

दरअसल, 16वीं लोकसभा के लिए अपने सांसदों की संख्या बढ़ाने की अजित की छटपटाहट हो या फिर नया राजनीतिक आशियाना तलाश रहे अमर-जयाप्रदा की बेकरारी, दोनों ही पक्षों को एक दूसरे का साथ फायमेंद लग रहा है। इसलिए अजित ने अमर और जया प्रदा के लिए अपनी पार्टी के दरवाजे खोलने में एक पल नहीं लगाया।

वह भी तब जब जया प्रदा की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात काफी सकारात्मक मानी जा रही थी और कांग्रेस में उनके शामिल होने की प्रबल संभावनाएं थीं। खुद जयाप्रदा भी कई बार सोनिया-राहुल के गुण गाते दिखीं, लेकिन अमर सिंह के मामले में ऐसा पेंच फंसा कि दोनों अब पंजा दिखाते नहीं बल्कि सियासी हैंडपंप चलाते नजर आ रहे हैं।

अमर सिंह के सियासी पहलू और उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा पर नजर डालें तो सपा से निष्कासित होने के बाद वह स्वयं बयान दे चुके थे कि अब सपा में वापसी नहीं करेंगे। वहीं भाजपा को लेकर उन्होंने कहा था कि न भाजपा उन्हें बुलाएगी और न वह जाएंगे, लेकिन कांग्रेस को लेकर वह हमेशा से नम्र रवैया अपनाए हुए थे। तभी से माना जा रहा था कि कांग्रेस उनकी पहली पसंद है।

अमर सिंह अपनी दबाव की राजनीति और महत्वकांक्षाओं के लिए जिस तरह से जाने जाते हैं, वैसा माहौल उन्हें कांग्रेस में नहीं मिलना तय था। सपा में रहते हुए वह मुलायम के साथ साये की तरह रहते थे और हर सियासी फैसले में उनकी दखलंदाजी रहती थी। यहां तक कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं तक को अमर सिंह ने किनारे करवा दिया था, लेकिन कांग्रेस में ऐसा करना संभव नहीं था।

सियासत में हर चीज अच्छी तरह से 'व्यवस्थित' करने के लिए मशहूर अमर सिंह भले ही सपा में ऐसे इकलौते नेता रहे हों, लेकिन कांग्रेस में उनके जैसों की फौज है। जाहिर है ये फौज अमर सिंह को कांग्रेस में हावी होने का मौका नहीं देती। वहीं अन्य दलों की बात करें तो बसपा में मायावती जैसी 'वन वूमेन आर्मी' के आगे भी अमर सिंह की दाल नहीं गलने वाली थी।

ऐसे में अमर सिंह के लिए रालोद सबसे मुफीद सियासी घर था। रालोद और कांग्रेस का गठबन्धन होने के कारण वह अजित सिंह के साथ रहकर भी कांग्रेस के करीबी बने रह सकते थे। वहीं छोटा दल होने के कारण वह मुलायम की तरह अजित पर भी अपने सियासी हुनर का जाल फेंकने में कामयाब हो सकते हैं।

खुद अजित भी जब सियासत के पल्लू से बंधा रहने की चाहत पालते हों, तो ऐसे में उन्हें अमर सिंह से बेहतर 'मैनेज' करने वाला नेता नहीं मिल सकता। वहीं जया प्रदा का नाम जुड़ने से रालोद में भी अब बॉलीवुड के ग्लैमर का तड़का लगता नजर आ रहा है। जया प्रदा रालोद में कहीं न कहीं अनुराधा चौधरी की कमी पूरी कर सकती हैं। वह लोकसभा सांसद हैं और जिस तरह से उन्हें बिजनौर से उतारे जाने की बात हो रही है, एक चर्चित चेहरा होने के कारण रालोद को इसका लाभ मिल सकता है।

अमर सिंह का साथ अजित के लिए इसलिए भी फायदेमंद माना जा रहा है, क्योंकि समाजवादी पार्टी लंबे समय से अजित की राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें घेरने में जुटी हुई है।

ऐसे में विधानसभा चुनाव के दौरान अपने राष्ट्रीय लोकमंच के जरिए पूर्वाचल में बेहद सक्रिय रहे अमर सिंह का साथ अजित को पूर्वाचल में फायदा पहुंचा सकता है, जिससे पश्चिमी उप्र तक सीमित रालोद अब पूर्वाचल में भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर सकेगी और हरित प्रदेश की राजनीति करने वाले अजित अब पूर्वांचल का राग भी अलाप सकेंगे।

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