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पुराने क्रांतिकारी को भविष्य की बागडोर

सूत न कपास जुलाहों में लठ्ठम-लठ्ठा। ऐसा ही कुछ लोकतंत्र के मुंहाने पर बैठे पड़ोसी देश नेपाल में हो रहा है। राष्ट्रपति पद को लेकर वहां घमासान मचा हुआ है। वैसे नेपाली संविधान में पहले इस पद के लिये कोई व्यवस्था नहीं थी। लेकिन संविधान के पुननिर्माण के लिए बनी समिति की बीती 28 मई को हुई पहली बैठक में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के सृजन के लिये संशोधन कर प्रावधान कर दिया गया है। तभी से इस पद के लिये हवा में तमाम नाम तैर रहे हैं और सियासत तेज हो गई है। इस पद के लिये प्रधानमंत्री गिरिाा प्रसाद कोईराला से लेकर वामपंथी नेता माधव नेपाल तक नेपाल में लोकतंत्र की बहाली से जुड़ी तमाम हस्तियों के नामों की चर्चा है। हाल के चुनाव में बहुमत से कुछ दूर रही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने बुजुर्ग क्रांतिकारी राम राजा प्रसाद सिंह का नाम राप्ट्रपति पद के लिये उछाल कर सबको चौंका दिया है। सिंह के नाम पर वहां की तीन और पार्टियों ने भी अपनी सहमति व्यक्त कर दी है। इसके बाद सिंह की इस पद पर उम्मीदवारी को पक्का माना जा सकता है। जब भी चुनाव हुए तो वह नेपाल के पहले राष्ट्रपति होने का गौरव प्राप्त कर सकते हैं। 1में नेपाल की पूर्वी तराई के सप्तरी जिले में जन्मे राजा राम को संघर्ष विरासत में मिली हुई है। उन्हें छ: साल की उम्र में जेल जाना पड़ा, क्योंकि उनके पिता जय मंगल प्रसाद सिंह राणा राजवंश की तानाशाही के खिलाफ चलाये जा रहे संघर्ष में भाग ले रहे थे। उनके पिता के लोकनायक जयप्रकाश नारायण और समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया से गहर ताल्लुक थे। राजा राम पर अपने पिता द्वारा चलाये गये लोकतांत्रिक आंदोलन का काफी प्रभाव रहा है। इसी के चलते उन्होंने अपना पूरा जीवन नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के लिये लगा दिया। राजा राम का भारत से भी गहरा रिश्ता रहा है। उनकी उच्च शिक्षा भारत में ही हुई। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. किया है और कानून की अपनी पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से की है। राजा राम पांच दशकों से अधिक समय से नेपाल के राजतंत्र के खिलाफ सक्रिय हैं। गांधीगिरी की जगह उन्होंने नेपाल में लोकशाही की स्थापना के लिये दादागिरी का रास्ता अपनाया। 1में राजमहल, नेपाली संसद और होटल अन्नपूर्णा होटल में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के प्रमुख इांनीनियर थे। इस हमले में आठ लोगों की जानें गई थीं। अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण राजाराम को राजा महेन्द्र ने कई बार जेल में बंद किया। उन्हें नेपाली राजतंत्र को उखाड़ने के लिये एक बार फांसी की सजा भी सुनाई गई। भूमिगत होने के चलते फांसी की सजा तामील नहीं हो पाई। अपने भूमिगत जीवन के दौरान वे अधिकांश समय भारत में ही रहे। क्रांतिकारियों और राजा के बीच युद्ध विराम के बाद 2003 में राजा राम नेपाल वापस लौटे और उन्होंने नेपाल में लोकतंत्र बहाली की लड़ाई जारी रखी। अब लोकतंत्र नेपाल में दस्तक दे रहा है तो बहत्तर वर्षीय इस क्रांतिकारी की आंखों में एक बार फिर चमक आ गई है। माओवादी नेता प्रचंड ने कहा है कि वह नये नेपाल में राजा राम को सम्माजनक पोजीसन देना चाहते हैं। यदि सब कुछ ठीक रहा तो राजा राम नेपाल के पहले राष्ट्रपति हो सकते हैं।

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