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मौजूदा दौर के सबसे बड़े गांधीवादी

पिछले दिनों भारत में पर्यावरण आंदोलन के शुरुआती लोगों में से एक चंडी प्रसाद भट्ट को गांधी शांति पुरस्कार दिया गया। यह पुरस्कार हर साल भारत सरकार देती है। मुझे शायद इस वाक्य में ‘तकनीकी रूप से’ जोड़ना चाहिए था, क्योंकि पिछले दस वर्ष में जब से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार है, तब से यह पुरस्कार सिर्फ दो बार दिया गया है। 2005 में यह पुरस्कार दक्षिण अफ्रीकी धर्मशास्त्री और कार्यकर्ता डेसमंड टूटू को दिया गया। अब आम चुनाव सामने है, तब चंडी प्रसाद भट्ट को चुना गया।

गांधी शांति पुरस्कार का विचार सबसे पहले 1994 में गांधीजी की 125वीं जयंती के मौके पर रखा गया था। पीवी नरसिंह राव तब प्रधानमंत्री थे। राव बहुत विद्वान आदमी थे और नेहरू-गांधी परिवार के साथ उनके रिश्ते कुछ नरम-गरम थे। 1980 के दशक में वह इंदिरा और राजीव गांधी के आज्ञाकारी बने रहे, लेकिन जब वह अचानक सन 1991 में प्रधानमंत्री बन गए, तो उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी। उन्होंने अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया और गांधी शांति पुरस्कार स्थापित किया। राव गांधीजी का सचमुच सम्मान करते थे, इसमें शक नहीं। लेकिन गांधीजी के नाम से पुरस्कार स्थापित करके वह इंदिरा गांधी की विरासत को हलका सा झटका भी दे रहे थे। इसकी वजह यह थी कि राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद अपनी मां के नाम से एक पुरस्कार स्थापित किया।

सरकार का दावा था कि यह पुरस्कार नोबेल शांति पुरस्कार जितना ही प्रतिष्ठित होगा। शांति, निशस्त्रीकरण और विकास के लिए पहला इंदिरा गांधी पुरस्कार सन 1996 में न्यूयॉर्क के पार्लियामेंटेरियन फॉर ग्लोबल एक्शन को दिया गया। सन 1991 में राजीव गांधी की श्रीलंका के तमिल आतंकवादियों ने हत्या कर दी। उसी साल उन्हें मरणोपरान्त इंदिरा गांधी पुरस्कार दिया गया। यह नरसिंह राव का राजीव गांधी की हत्या की निर्ममता पर संवेदना और देश के पहले परिवार के प्रति उनकी कृतज्ञता का ज्ञापन था। तीन साल बाद उन्होंने अपने को पुराने संरक्षकों से मुक्त कर लिया। इस बात का पहला प्रमाण महात्मा गांधी शांति पुरस्कार की स्थापना थी। इस पुरस्कार में एक करोड़ रुपये दिये जाने थे, जबकि इंदिरा गांधी पुरस्कार सिर्फ 25 लाख रुपये का था।

गांधी शांति पुरस्कार सबसे पहले उपनिवेशवाद के खिलाफ महान योद्धा जुलियस न्येरेरे को दिया गया। बाद में इसे श्रीलंका के सामाजिक कार्यकर्ता एटी आर्यरत्ने, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग की विधवा कोरेटा स्काट किंग और बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक को दिया गया। इंदिरा गांधी और महात्मा गांधी पुरस्कारों के उद्देश्य काफी हद तक समान हैं। दोनों ही व्यक्तियों या संस्थाओं को दिए जा सकते हैं। दोनों शांति के लिए दिए जाते हैं, लेकिन इंदिरा गांधी पुरस्कार के साथ ‘विकास’ भी जुड़ा हुआ है। दोनों पुरस्कारों को पाने वालों की सूची का अध्ययन दिलचस्प हो सकता है।

इंदिरा गांधी पुरस्कार थोड़ा ज्यादा राजनीतिक है। यह पुरस्कार कई बहुत अच्छे लोगों को दिया गया है, लेकिन हामिद करजई या शेख हसीना को पुरस्कार राजनीतिक उद्देश्यों से ही दिया गया। करजई और हसीना समेत 12 वर्तमान या पूर्व राष्ट्राध्यक्षों को यह सम्मान दिया गया है। जबकि गांधी पुरस्कार शुद्ध रूप से सामाजिक कार्य की ओर झुका हुआ है। सिर्फ एक नाम दोनों सूचियों में है। वह चैक नाटककार कार्यकर्ता वाक्लॉव हैवल का है, जिन्हें 1993 में इंदिरा गांधी पुरस्कार दिया गया और दस साल बाद महात्मा गांधी पुरस्कार। दो नाम इन दोनों सूचियों में नहीं हैं, जिन्हें यह पुरस्कार मिलना चाहिए था।

दलाई लामा और आंग सांग सू की का नाम शायद विदेश मंत्रालय की आपत्तियों की वजह से नहीं है। एक अंतिम तुलना ज्यादा प्रासंगिक है, संप्रग के दस सालों में सिर्फ दो बार महात्मा गांधी पुरस्कार दिया गया, जबकि इंदिरा गांधी पुरस्कार हर साल दिया गया है। सब कुछ के बावजूद यह कहना होगा कि चंडी प्रसाद भट्ट को यह पुरस्कार मिलना अत्यंत स्वागत योग्य है। उनका जन्म सन 1934 में गढ़वाल के एक किसान परिवार में हुआ और उन्होंने अपना जीवन अपने समाज की अत्यंत प्रभावशाली तरीके से सेवा करते हुए बिताया। चंडी प्रसाद भट्ट पहले षिकेश, बद्रीनाथ के इलाके में बस कंडक्टर की नौकरी करते थे, जब उन्होंने एक जनसभा में जयप्रकाश नारायण का भाषण सुना। उनसे प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

सन 1964 में भट्ट जी ने दसौली ग्राम स्वराज्य संघ की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य लघु उद्योगों के जरिये स्थानीय रोजगार पैदा करना था। इन्होंने सहकारी संस्था स्थापित की, जो मधुमक्खी पालन और खेती के औजार बनाने में सहयोग करती थी। अपने कामकाज के दौरान इस संस्था का टकराव जंगल विभाग से हुआ, जो गांव के कारीगरों को तो कच्चा माल नहीं देता था, लेकिन मैदानों की कागज और प्लाईवुड फैक्ट्रियों को लकड़ी बेच रहा था। सन 1970 में अलकनंदा में एक भीषण बाढ़ आई, जो काफी हद तक जमीन के क्षरण और जंगलों की कटाई की वजह से थी। भट्ट जी को यह समझ में आ गया कि व्यावसायिक वानिकी न सिर्फ सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी विध्वंसक है।

अप्रैल 1973 में चंडीप्रसाद भट्ट ने पेड़ों की कटाई के खिलाफ गांव वालों के आंदोलन का नेतृत्व किया। यहां से ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई, जिसे भारतीय पर्यावरण आंदोलनों की शुरुआत मान सकते हैं। यह आंदोलन स्थानीय ग्रामीणों के अधिकारों की रक्षा फैक्ट्रियों को लकड़ी की नीलामी रोकने के लिए था। पिछले 40 साल से भी ज्यादा समय से चंडी प्रसाद भट्ट प्रचार से दूर रहकर चुपचाप उत्तराखंड के लोगों के बीच काम कर रहे हैं। जिन मुद्दों को उन्होंने उठाया है, उनमें रोजगार, महिलाओं का सशक्तीकरण, दलितों की समानता और पर्यावरण की रक्षा है। अपने काम से उन्होंने कार्यकर्ताओं और लेखकों की कई पीढ़ियों को प्ररेणा दी है। माधव गाडगिल, अनिल अग्रवाल और सुनीता नारायण, अनुपम मिश्र, शेखर पाठक, सच्चिदानंद भारती ने किसी न किसी रूप में भट्ट से प्रेरणा हासिल की है।

मैं चंडी प्रसाद भट्ट से उनके शहर गोपेश्वर में सन 1981 में मिला था। मैंने उन्हें चिपको आंदोलन का शुरुआती इतिहास सुनाते हुए देखा है, ‘पहाड़’ पत्रिका के विमोचन के अवसर पर, मसूरी में आईएएस प्रशिक्षण पा रहे लोगों को संबोधित करते हुए और अपने पोते के साथ दिल्ली में खेलते हुए देखा है। हर बार मैं उनकी गरिमा, उनकी बुद्धिमता, उनकी प्रतिबद्धता और गहरे, सरल राष्ट्रभक्ति से प्रभावित हुआ हूं। जब मैंने अखबारों में इस पुरस्कार के बारे में सुना, तो मैंने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन उनका फोन नहीं मिल रहा था। मैंने सोचा कि वह पहाडमें में किसी यात्रा में होंगे। मैं गलत नहीं था, जब मुझे उनसे बात करने का मौका मिला, तब उन्होंने बताया कि वह अभी-अभी डॉकपत्थर पहुंचे हैं। यह कस्बा गढ़वाल के दूसरे छोर पर है।

दस साल पहले भट्ट जी यह यात्रा बस से कर लेते थे, लेकिन अब लगभग 80 की उम्र में उन्होंने कार से जाना स्वीकार किया। गांधी शांति पुरस्कार की खबर उन्हें एक ऐसे दिन मिली, जब वह चुपचाप अपना काम कर रहे थे। संप्रग सरकार अपने दो कार्यकाल में बहुत-सी गलत और व्यर्थ बातें की होंगी, लेकिन इस बार उन्होंने अच्छा काम किया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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