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कृषि की समस्याएं और भी हैं मौसम के अलावा

बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों के सामने संकट खड़ा कर दिया है। कितना नुकसान हुआ है, अभी इसका अंदाज नहीं लगाया जा सका है। यह नुकसान भी उस समय हुआ है, जब यह माना जा रहा था कि इस साल फसल बहुत अच्छी होगी। पिछले कुछ समय से कृषि विकास-दर ठीक-ठाक ढंग से बढ़ रही थी, इस साल इस पर मौसम की मार पड़ सकती है। वह भी तब, जब औद्योगिक विकास-दर के मोर्चे पर भी आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे।

लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। हर कुछ साल बाद कहीं न कहीं ऐसा हो जाता है और ऐसे मौके पर किसानों को राहत देने का कोई स्थायी तरीका अभी तक विकसित नहीं किया जा सका है। राहत का एक तरीका फसल बीमा है, लेकिन इस पर सिर्फ चर्चा होती है। इसे कभी बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया जा सका। फसल बीमा के अभाव में किसानों को आपदा का मूल्य चुकाना पड़ता है, जिसकी वजह से कई किसान एक ही झटके में गरीबी की रेखा से नीचे पहुंच जाते हैं। भारतीय कृषि क्षेत्र की यह अकेली बड़ी समस्या नहीं है।

भारत में सबसे तेज गति से बढ़ती हुई कृषि आबादी बता रही है कि देश की कई समस्याएं काफी गंभीर होती जा रही हैं। अमेरिका की प्रसिद्ध वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट ने एक रिपोर्ट में यह बताया है कि वर्ष 1980 से वर्ष 2011 के बीच भारत और चीन की कृषि (पर निर्भर) आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है। जहां भारत की कृषि आबादी में 50 फीसदी की भारी वृद्धि हुई है, वहीं चीन की कृषि आबादी में 33 फीसदी का इजाफा हुआ है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में कृषि आबादी सबसे ज्यादा भारत में ही बढ़ी है। अमेरिका की कृषि आबादी इस अवधि के दौरान 37 फीसदी घट गई।

अमेरिका में बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण होने से कृषि आबादी में खासी कमी संभव हो पाई है। ग्लोबल स्तर पर भी कृषि आबादी इस दौरान तकरीबन 12 फीसदी घट गई है। कृषि पर निर्भर आबादी बढ़ने से इस क्षेत्र में लोगों की आय बढ़ने की बजाय घट रही है, जिससे किसानों की रुचि कृषि-कार्यों में घट रही है। गांवों में रोजगार के वैकल्पिक अवसर भी कम हैं। और फिर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी कम होती जा रही है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) का कहना है कि 40 प्रतिशत किसान खेती को बेहद जोखिम भरा और दुखदायी पेशा मानते हुए इसे छोड़ना चाहते हैं।

समस्या यह भी है कि बदलती दुनिया में हम अपनी कृषि को न तो आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर दे सके हैं और न ही कृषि उत्पादों को आधुनिक बाजार व्यवस्था से जोडम् सके हैं। चीन जैसे देशों में यह काम काफी तेजी से हुआ है। देश की नौकरशाही कृषि के लिए जो योजनाएं बनाती है, उसमें से ज्यादातर का किसानों के लिए कोई मतलब नहीं है। वे तो मौसम और उसकी मार पर ही निर्भर हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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