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तेरे द्वार खड़ा है चुनाव, भगत भर दे रे झोली

बाअदब बामुलाहिजा होशियार। लोकतांत्रिक देश के मोस्ट वांटेड चुनाव पधार रहे हैं। मुनादी कर दी प्रमुख चुनाव आयुक्त ने। दुनिया का सबसे भारी-भरकम लोकतंत्र सात अप्रैल से 16 मई तक ‘सोलहवीं’ लोक-सभा के ‘श्रंगार’ निमित्त चुनाव ‘चालीसा’ का पाठ करेगा। एक्जेक्ट चालीस दिन ले त्तेरे की.. दे त्तेरे की। होली की आड़ में जुबानी कीचड़ गोबर। सीने की चौड़ाई नापने का फीता और पुंसत्व का सर्टिफिकेट थैलों में रख पहले से ही विचर रहे हैं दिग्गज।

रैलियों का रेला और ‘जुटाया-बुलाया’ जन शक्ति प्रदर्शन चालू आहे। संघर्ष सफेद और काली दाढ़ी के दरमियान। गुण-दोष तज कुंडली मिलान। गठबंधन की बयार। बतर्ज मेरे पास मां है, मेरे पास पासवान है। तीसरा मोर्चा हवा-हवाई। किस विधि ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, जो सुर बने हमारा। अपना-अपना खोमचा उठाए घूम रहे हैं सभी। एक अलाप देश को डायनेस्टी से मुक्त कर लोकतंत्र स्थापित करना है। दूसरी ललकार- सांप्रदायिक ताकतों को कुचल बढ़े समाजवाद की ओर। अवसरवाद के घटाटोप में लालटेन पकड़े चालू आत्माएं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने का हुंकार भर रही हैं।

पिछले दस साल से जमे पैर इस बार राजनीति तज ‘काज’-नीति और राष्ट्र निर्माण के प्रमाण की दुहाई दे अपना तीसरा संस्करण निकालने के लिए ‘हाथ’ पसार रहे हैं। अपनी अपनी ढपली, अपने-अपने राग। डायनेस्टी और टी स्टाल के इस कोलाहल में बुनियादी बातें सायलेंट मोड पर। मफलर और टोपीधारियों। एक कम 50 दिनों के परफार्मेंस के मद्देनजर गरमी के चुनाव में ‘आप’ का क्या होगा जनाबे आली।

चुनाव उनके गले पड़ा ढोल है, बिना बजाए छूटने वाला नहीं। घोषणापत्रों की लाल-नीली-पीली तिरंगी भगवा पतंगें चुनावी आकाश पर लहराने वाली हैं। पेच वे लड़ाएंगे, हत्थे से जनता ही कटेगी। वे आ रहे हैं। तेरे द्वार खडम ‘धनवान’, भगत भर दे रे झोली..। ...ना मांगू सोना-चांदी., ना चाहूं हीरा-मोती। दे-दे ..की याचक मुद्रा। फकत एक वोट..., बटन दबवा ‘काज’ सिद्ध करना है उन्हें। थोड़े दिनों की खुशामदीद। पैर पुजवा लो भइये। सोलह मई बाद फिर राहुकाल। मुसीबत में फंसना ही नियति है।

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