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इतिहास, पुराण और हम

भारत में जो पुराण हैं, वे माइथोलोजी हैं। मगर पुराण यानी पुरातन नहीं, पुराण का सही अर्थ है मिथक, कहानियां। ऐसी कहानियां, जिनके गर्भ में सत्य छिपा है। सत्य और तथ्य में फर्क है। इतिहास तथ्य है, पुराण सत्य है। भारतीय इतिहास में तिथि और समय महत्वपूर्ण नहीं है, इसलिए उपनिषदों का समय या वेद कब रचे गए, यह सही-सही बताना असंभव है। अनुमान ही हो सकता है।

इतिहास सही माना जाता है और पुराण काल्पनिक। लेकिन जो किसी तल पर कल्पना है, वह किसी दूसरे तल पर सच्चाई होती है, क्योंकि जीवन के अनेक तल हैं। पुराण का अर्थ है, जीवन का सार थोड़ी-सी कहानियों में रख दिया है। इतिहास सिर्फ बाहरी घटनाओं की बात कहता है। इतिहास का अर्थ है: ‘इति ह आस’ अर्थात ऐसा हुआ, वह क्यों हुआ, कैसे हुआ। पुराण का मतलब होता है, ऐसी बात, जिसका इतिहास कोई लेखा-जोखा नहीं रख सकेगा। इतिहास तो लेखा-जोखा रखता है राजनीति का, जिसका कोई मूल्य नहीं है। किसने किसको हराया और किस राजा ने किस पर राज किया, इन घटनाओं का आज क्या मूल्य है?

सारे इतिहास इंसान के खून से रंगे हैं। उनकी कहानियां याद रखने से क्या लाभ? घड़ी भर जो मंच पर आते हैं, वे बड़ा शोरगुल मचा देते हैं, घड़ी भर के लिए जो प्रभावशाली मालूम पड़ते हैं, इतिहास उनका अंकन कर लेता है। पुराण उनका अंकन करता है, जिनकी महिमा सदा के लिए है। पुराण काव्य है, घटनाओं को प्रतीकात्मक ढंग से कहने की शैली है। भारत के जो भी मिथक हैं, उन्हें समझने के लिए पुराण की दृष्टि को समझना बहुत जरूरी है। वैज्ञानिक बुद्धि विकसित कर हमने भौतिक समृद्धि का अंबार लगा लिया, लेकिन इसका आनंद लेने वाला जो मनुष्य है, जो मन है, उसके विकास को भुला दिया गया। जिसका नतीजा है आज की दुखी, संत्रस्त, हिंसक मानवता। जीवन में सुकून के लिए फिर से काव्य और कथाओं के रहस्य को वापस लाना होगा।

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