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स्त्री के लिए एक कमरा

एक स्त्री के लिए एक कमरा। कैसी अजीब-सी बात लगती है न सुनने में? भला एक स्त्री के लिए एक कमरे के अलग से होना का क्या अर्थ है? जरूरत ही क्या है, ऐसी कोई? अरे जनाब, जिस जमाने में दो कमरे के मकान में पूरा परिवार बसर करता हो, भला किसी स्त्री के लिए एक कमरे की बात का क्या औचित्य हो सकता है? तो यहां मेरा तात्पर्य कम से कम ईंट और गारे से बने कमरे से नहीं है, उससे भी हो सकता है, लेकिन उतना ही नहीं।

मेरा तात्पर्य है, एक स्त्री के जीवन के 24 घंटों में से उसके लिए एक टुकड़ा स्पेस होने से। ऐसा स्पेस, जहां वह खुद को महसूस कर सके। अपनी तमाम चिंताओं और परेशानियों को उतारकर रख सके। तमाम हिदायतों और नसीहतों से पीछा छुड़ा सके। रियाज कर सके, लिख सके, खेल सके, खुलकर हंस सके या रो भी सके। इस तरह के स्पेस की स्त्रियों के जीवन में कोई जरूरत भी है यह उन्हें सारी उम्र पता नहीं चल पाता?

यों एक कमरे, सॉरी स्पेस की जरूरत तो पुरुषों को भी है, फिर स्त्रियों के लिए ही इसकी पैरवी की बात क्यों? सवाल वाजिब है, पर अपने भीतर ही इसका जवाब छिपा है। जिस समाज में हम जी रहे हैं, पुरुषों के लिए अपना स्पेस क्रिएट करना कोई मुश्किल काम नहीं, मुश्किल है स्त्रियों के सामने, जिन्हें एक ही वक्त पर पॉवर प्वॉइंट प्रेजेंटेशन बनाना होता है और बच्चे का दूध भी। एक वक्त पर ऑफिस में कोई मीटिंग कॉल करनी होती है और घर में डिनर की तैयारी भी। भागकर मेट्रो पकड़नी होती है और बुखार में तपती देह को इग्नोर करना होता है।

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