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आयाराम-गयाराम

राजनीति में एक दौर में दलबदल का ऐसा जोर था कि कई नेता एक दिन में कई बार दलबदल कर लेते थे। कांग्रेसी नेता यशवंतराव चह्वाण ने ऐसे नेताओं को ‘आयाराम-गयाराम’ नाम दिया था। अब दलबदल विरोधी कानून इतना सख्त है कि दलबदल जनप्रतिनिधियों के लिए तो थोडम मुश्किल है, लेकिन चुनाव के दौरान में आयाराम-गयाराम का जमाना लौट आता है।

पिछले कुछ दिनों में इतने लोग दल बदल चुके हैं कि उनका हिसाब रखना मुश्किल है। चुनावों के दौर में दलबदल का फायदा यह होता है कि जन-प्रतिनिधियों को अपनी सदस्यता खत्म होने का कोई डर नहीं होता, क्योंकि विधायिका का कार्यकाल खत्म होने को होता है। आम तौर पर दलबदल का उद्देश्य बेहतर संभावनाओं वाली पार्टी से टिकट मिलना ही होता है। चुनाव में लगभग एक महीना है और इस बीच भी दलबदल कानून से मिली छूट का फायदा काफी लोग उठा रहे हैं। दलबदल की दिशा से यह भी संकेत मिल जाते हैं कि हवा का रुख किधर है।

हवा के रुख से धर्मनिरपेक्ष लोग छद्म धर्मनिरपेक्षता के विरोधी हो जाते हैं, कई कट्टर राष्ट्रवादी धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं, समाजवादी पूंजीवादी हो जाते हैं, वगैरह। इस दौर में पार्टियां अमूमन हर दलबदलू का स्वागत करती हैं, इससे यह प्रभाव बनता है कि उसके पक्ष में माहौल है। फिलहाल भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वाले लोगों की तादाद काफी बड़ी है। क्योंकि भाजपा के सरकार बनाने में ज्यादा लोगों को संभावना नजर आ रही है। रामविलास पासवान का भाजपा से गठबंधन तकनीकी तौर पर दलबदल नहीं है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर उनका धर्मनिरपेक्ष खेमे से मोदी समर्थक खेमे में जाना दलबदल ही कहलाएगा।

इससे ज्यादा जटिल संतुलन महाराष्ट्र में मनसे नेता राज ठाकरे ने साधा है। उन्होंने भाजपा के साथ सीटों का तालमेल का फैसला किया है, लेकिन वह उसकी सहयोगी पार्टी शिवसेना के साथ तालमेल नहीं करेंगे। यानी कुछ सीटों पर वह शिवसेना के वोट काटेंगे, उन सीटों पर उनका अघोषित तालमेल कांग्रेस और राकांपा के गठबंधन के साथ होगा। जिसे हम विचारधारा कहते हैं, उसकी असली औकात इन्हीं दिनों नजर आती है। भारतीय राजनीति में ज्यादा प्रभावी तत्व जाति, इलाका, धर्म, व्यक्तिगत रिश्ते वगैरह होते हैं, सलिए लोगों को पार्टियां बदलने में बहुत दिक्कत नहीं आती। मंडलवाद के उभार के बाद भारतीय राजनीति में उथल-पुथल हुई है।

ऐसे में, उत्तर प्रदेश में कई ऐसे नेता मिल जाएंगे, जो राज्य की चारों मुख्य पार्टियों कांग्रेस, भाजपा, बसपा और सपा में रह चुके हैं, कुछ नेता इनके अलावा कुछ अल्पजीवी पार्टियों में भी रह चुके हैं। जिन राज्यों में दो ही पार्टियों का वर्चस्व है, वहां राजनीति अपेक्षाकृत स्थिर रही, हालांकि दलबदल तो वहां भी हुए हैं। जब दलबदल कानून बनाया गया था, तब कई लोग इसके खिलाफ थे, उनका मानना था कि यह कानून नेताओं को पार्टियों का गुलाम बना देता है, उनकी आजादी को छीन लेता है। यह कई मायनों में सही भी है कि जनप्रतिनिधि अक्सर न चाहते हुए भी पार्टी की लाइन मानने पर मजबूर हो जाते हैं।

इस कानून ने पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र को भी घटाया है। लेकिन यह भी सच है कि पार्टियों में वैचारिक मतभेद वैसे भी महत्वपूर्ण नहीं होते, नेताओं के लिए महत्वपूर्ण वह जाति, समूह या इलाका होता है, जिसमें उनका प्रभाव होता है। चुनाव के दौर में दलबदल के पीछे व्यक्तिगत शिकायतें या स्वार्थ ही होते हैं, जिन्हें कुछ सैद्धांतिक मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जाता है। ऐसे में आयाराम कब गयाराम हो जाएंगे और गयाराम कब आयाराम, इसका हिसाब लगाना बहुत मुश्किल है।

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