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हमें संभलना है

जब सत्ता स्वार्थ में डूबी होती है, जब योग्यताओं को दरकिनार कर दिया जाता है और जब अर्थव्यवस्था कालेधन से त्रस्त हो, तब पूरी व्यवस्था डगमगाने लगती है। हमारी व्यवस्था इसका उदाहरण है।

विचार-व्यवहार के स्तर पर आज कई नेता भ्रष्ट नजर आते हैं, चूंकि जन-जागरूकता बढ़ी है, इसलिए लोग उनकी कारगुजारियों को उजागर कर रहे हैं। लेकिन जनता के सामने बडम सवाल यह है कि क्या कारगुजारियों को उजागर करने भर से काम चल जाएगा? शायद नहीं। तब क्या करना होगा? जवाब है अपने मताधिकार का सही इस्तेमाल करना होगा।

बेशक कुछ लोग कह सकते हैं कि इससे क्या फर्क पड़ेगा, हम तो बरसों से यह करते आए हैं? उन्हें मैं यह कहना चाहूंगा कि बार-बार की जाने वाली कोशिशें एक दिन कामयाब हो जाती हैं और इस बार तो हमारे सामने चुनौती बड़ी है। हमें अपनी पूरी व्यवस्था को संभालना है। सत्ता को उनके दायित्व के बारे में बताना है। योग्य लोगों को आगे बढ़ाना है और कालेधन के संकट को दूर करना है।
पीआर राव, पहाड़गंज, दिल्ली

मत तोड़ो परिवार
यूनानी दार्शनिक सुकरात ने परिवार को प्राथमिक पाठशाला कहा है। तानाशाह हिटलर ने भी माना था कि एक मां के लिए सौ सैनिक कुर्बान। लेकिन आज यह परिवार टूट रहा है, जबकि मानव के विकास के लिए यह एक महत्वपूर्ण संस्था है। पुराने भारतीय परिवार इसके बड़े अच्छे उदाहरण माने जाते हैं। लेकिन बाद में स्थितियां बदलीं और संयुक्त और एकल परिवार की अवधारणा बनीं।

संयुक्त परिवार में तीन पीढ़ियां एक साथ होती थीं और एकल परिवार में एक पीढ़ी या दो पीढ़ियां। लेकिन आज स्थिति यह बन आई है कि एकल परिवार भी टूट रहा है। अब तो बेटा अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहता। पति-पत्नी में अनबन है। बुजुर्गों को समाज के हाशिये पर धकेल दिया गया है, इसलिए परिवार प्रभावित होने लगा है। पश्चिमी सभ्यताओं से भी यह प्रवृत्ति बढ़ी है, जो दुखद है।
राम कुमार शर्मा, माधवनगर, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश

लाल आतंक
चुनाव आयोग ने मतदान के दिन निश्चित कर दिए हैं। ऐसे में, उन राज्यों को विशेष तैयारी करनी होगी, जहां नक्सलवाद की समस्या है, जैसे छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा। निश्चित रूप से आतंकवाद से बड़ी समस्या है नक्सलवाद। यदि हम एकजुट हो जाएं, तो आतंकवाद को जड़ से मिटा सकते हैं, क्योंकि इसके सूत्र बाहरी हैं। परंतु नक्सली तो हमारे अपने हैं, उनसे कैसे निपटा जाए? हथियार से या बातचीत से? महात्मा गांधी ने कहा था कि हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। जब हमारी सेना और पुलिस बंदूक उठाएगी, तो नक्सली भी जवाबी कार्रवाई करेंगे। फिर क्या होगा? इसलिए अच्छा यह होगा कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता निकाला जाए। उनकी मांगों को सुनी जाए और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया जाए।
किशोर कुमार, फरीदाबाद, हरियाणा

एडमिरल का आदर्श
कुछ समय से पनडुब्बियां लगातार दुर्घटनाग्रस्त हुई हैं। 26 फरवरी को हुए पनडुब्बी हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए डी के जोशी ने नौसेना प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया। इस मामले में उन्होंने एक उच्च आदर्श स्थापित किया है। एक जमाना था, जब लाल बहादुर शास्त्री ने ट्रेन हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री से अपना इस्तीफा दिया था।

आजकल जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग घोटाले-घपलों के बाद बार-बार इस्तीफा मांगने पर भी इस्तीफा नहीं देते हैं, तब एडमिरल डीके जोशी ने यह कदम उठाकर फिर से मूल्यों की स्थापना का प्रयास किया है। लेकिन क्या एडमिरल के इस्तीफे से देश का भला हो पाएगा? मेरा मानना है कि उन्हें पद छोडम्ने की बजाय पनडुब्बी दुर्घटनाओं की त्वरित जांच करानी चाहिए थी। एक बेहतरीन नौसैनिक का ऐसे समय में पद छोड़ना व्यवस्था के सामने सवाल उठाता है।
डॉ. आशुतोष पंत, हल्द्वानी, नैनीताल

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