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25 साल बाद बसपा को मिली थी कामयाबी

ग्रेटर नोएडा/पंकज पाराशर। गौतमबुद्ध नगर में ऐन चुनाव के मौके पर सांसद सुरेंद्र सिंह नागर का मैदान से हटाना बहुजन समाज पार्टी के लिए बड़ा झटका है। दरअसल सुरेंद्र नागर ने ही पार्टी को पिछले चुनाव में 25 साल बाद पहली बार यहां कामयाबी दिलाई थी। मायावती का गृह क्षेत्र होने के बावजूद बसपा यहां शुरू से संघर्ष ही करती रही है। अब एक बार फिर पार्टी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी है। बसपा की नींव पड़ने के बाद पहली बार पार्टी ने वर्ष 1989 में लोकसभा चुनाव लड़ा था।

18 राज्यों में 245 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। खुर्जा सीट (पहले इस निर्वाचन क्षेत्र का यही नाम था) से उर्मिला को बसपा ने टिकट दिया। उर्मिला को महज 18,038 वोट मिले थे। वर्ष 1991 के चुनाव में तो इस सीट से बसपा ने किसी को टिकट ही नहीं दिया था। हालांकि पड़ोसी बुलंदशहर सीट से मायावती ने खुद चुनाव लड़ा था। उन्हें 73,544 वोट मिले और चौथे नंबर पर रही थीं। 1996 के चुनाव में खुर्जा सुरक्षित सीट से बसपा ने बीर सैन को बतौर उम्मीदवार खड़ा किया।

बीर सैन को 89,570 वोट मिले थे। 1998 के चुनाव में विजय सिंह ने चुनाव लड़ा। 96,392 वोट हासिल किए, जिसके बूते बसपा दूसरे नंबर तक पहुंच गई। वर्ष 1999 में फिर मध्यावधि चुनाव हुआ। इस बार बसपा ने फूल सिंह तोमर पर दांव खेला। फूल को 99,481 वोट मिले लेकिन पार्टी तीसरे नंबर पर खिसक गई। 2004 के चुनाव से पहले पूर्व मंत्री रवि गौतम ने बसपा का दामन थामा। पार्टी ने भी उन्हें मैदान में उतार दिया। रवि गौतम ने तत्कालीन सांसद और भाजपा प्रत्याशी अशेाक कुमार प्रधान को कड़ी टक्कर दी।

इस चुनाव में रवि गौतम को 1,73,551 वोट मिले, जबकि अशोक प्रधान को 2,14,701 वोट मिले थे। इस चुनाव ने जिले में बसपा को मजबूती से खड़ा कर दिया, जिसका फायदा विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को मिला। 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन हुआ। खुर्जा सीट का नाम बदलकर गौतमबुद्ध नगर संसदीय क्षेत्र हो गया। यह सीट आरक्षित से सामान्य श्रेणी में शामिल हो गई। परिणामस्वरूप सीट के तमाम सीमकरण बदल गए लेकिन इससे पहले 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने एकतरफा जीत हासिल करते हुए पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी।

2009 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा और बसपा के बीच संघर्ष देखने को मिला। भाजपा के डॉ. महेश शर्मा को बसपा प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नागर ने महज 15,904 मतों से पराजित कर दिया। इस बार भी डॉ. महेश शर्मा और सुरेंद्र सिंह नागर के बीच चुनावी टक्कर तय मानी जा रही थी लेकिन जिस ढंग से अचानक बसपा ने नागर को मैदान से हटाया, उससे सीट पर सारे समीकरण एक बार फिर बदलते नजर आ रहे हैं लेकिन इतना तो तय है कि 25 साल लंबे संघर्ष के बाद बसपा को जो कामयाबी यहां मिली, उसे गहरा धक्का लगा है।

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