DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

30 साल पहले होती थी निराली होली

सहारनपुर। हमारे संवाददाता।  होली पर्व और दुल्हैंड़ी के उल्लास की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। युवाओं में हर वर्ष की तरह इस बार भी होली को लेकर बेहद उत्साह है। बाजार भी रौनक हो उठा है। नगर में चल रहे होली मिलन कार्यक्रम उल्लास की दस्तक दे रहे हैं।

बावजूद इसके कुछ छूट रहा है और वह है पुरानी होला का उल्लास। पुराने शहर में बजुर्गो की लगने वाली चौपालों में जिक्र यही है कि आज की होली में वो उल्लास कहां जो उनके जमाने हुआ करता था। आखिर ऐसा क्या था आज से 20 साल पुरानी होली में इसी पर हमने पुराने शहर के लोगों से बात की तो कई रौचक जानकारियां निकलकर सामने आई। -------------------------------------------- वो होली तो धड़ल्ले की होली थीव्यापारी नेता शीतल टंडन बताते हैं कि आज से 30 साल पहले वाली होली का उल्लास ही अलग था।

शहर में कई स्थानों पर भट्ठियां चढ़ती थी। इन भट्टियों में टेसू और गुलाब के फूल पकाए जाते थे। फिर गुनगुने पानी को एक बड़े कड़ाव भरा जाता था और फिर चलती थी टोली। बस पूछिए इस टोली को जो मिला फिर उसके पकड़कर लगवाते थे कड़ाव में गोते। उस समय हर कोई खेलता था होलीचिलकाना क्षेत्र के गांव रघुनाथपुर की प्रधान रह चुकी 92 वर्षीय महिला इंदू बताती है कि उन दिनों की होली में उल्लास था। खुशी थी और प्रेमभाव था।

लोगों में भी होली खेलने का सलीखा था लोग फूलो से, चंदन से और टमाटरों से होली खेलते थे। हर कोई इस उल्लास में हिस्सा लेता था। आज की होली अच्छी है पर वो उल्लास कही खो गया हैं। पंद्रह दिन पहले शुरू होता था उल्लासआज से 30 साल पहले होली मनाने का तरीका भी अलग था। पंद्रह दिन पहले से ही रंग डालना शुरू हो जाता था और रंग नहीं डालने के एवज में बच्चों लोगों से पैसे लेते थे।

नीचे बाजार में चल रहे लोगों की टोपियां रस्सी में कुंडी बांधकर उठा लेते थे और फिर टोपियां देने के एवज में पैसे लिए जाते थे। होली शोभायात्रा का रहता था क्रेजशहर के पुराने लोग बताते हैं कि आज से 30 साल पहले शहर में होली की शोभायात्रा निकलती थी। इस शोभायात्रा में फूलों और रंगों की बौछार की जाती थी। लोगों में उत्साह इस बात को लेकर होता था कि उनपर शोभायात्रा के दोरान उड़ाया जा रहा रंग डले।

इस रंग कों केवल उल्लास ही नहीं बल्कि श्रद्धा के साथ भी जोड़ते थे लोग। बोरियों में भरकर आते थे टेसू के फूलआज से 30 साल पहले होली खेलने का तरीका भी अलग था। कक्कड़ गंज में आयुर्वेद दवाएं बेचने वाले व्यापारी जगदीश सैनी कहते हैं कि आज से 20 साल पहले तक शहर शाकम्भरी क्षेत्र से सहारनपुर में बोरियों में में भरकर टेसू के फूल आया करते थे। उस समय पांच से दस रुपये किलो तक टेसू के फूल मिलते थे।

टेसू के फूलों में गुलाब के फूल और चंदन मिलाकर रंग तैयार किया जाता था। टेसू के फूलों के आयुर्वेदिक गुण भी हैं और इसका गुनगुना पानी बदलते मौसम में दवा त्वचा और स्वास्थ्य के लिए दवा के रूप में काम करता है। इसकी सुगंध भी बेहद ममनोहक होती है। आइए खेलें टेसू के फूलों की होली यदि आप भी टेसू के फूलों की होली खेलना चाहते हैं तो इसके लिए बाजार से आपकों 40 से 45 रुपये किलों टेसू के फूल मिल जाएंगे।

ध्यान रहे कि फूल जितने ताजे हों उतना ही अच्छा है। इन फूलों को रात में ही पानी भिगोकर रख लें और अगले दिन पानी में उबाल लें। बाद में इस जब यह पानी गुनगुना हो जाए तो समझ लें कि पानी होली खेलने के लिए तैयार है। इस पानी में चंदन और गुलाब के फूलों को भी मिलाया जा सकता है। ं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:30 साल पहले होती थी निराली होली