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तमिलनाडु में बनते बिगड़ते गठबंधन

इन दिनों चेन्नई की पटरियां और फुटपाथ मुख्यमंत्री जे जयललिता की तस्वीरों से पटे पड़े हैं। आप जिधर भी अपनी निगाह घुमाएंगे, उनकी मुस्कराती हुई तस्वीरों वाले पोस्टर और होर्डिंग्स आपको दिखेंगे। इन तस्वीरों की खास बात यह है कि इनमें जयललिता के फोटो के पीछे संसद या लाल किले की छवियां दर्ज हैं। एक दिलचस्प पहलू यह है कि जिस तरह से दिल्ली के लोकाचार में राष्ट्रीय नेताओं को संबोधित किया जाता है, उसी तरह से तमिलनाडु में जयललिता को ‘अम्माजी’ के तौर पर पेश किया जा रहा है। अभी तक वह अपने राज्य में आम तौर पर ‘अम्मा’ कही जाती रही हैं। ये पोस्टर वही सब परोसते हैं, जिसका आदेश मुख्यमंत्री की तरफ से होता है। इन पर सिर्फ और सिर्फ जयललिता की तस्वीरें होती हैं। कुछ पर उनके राजनीतिक गुरु और पूर्व मुख्यमंत्री एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) के फोटो भी दिख जाते हैं। लेकिन पार्टी उम्मीदवारों या दूसरे नेताओं को यह बिल्कुल इजाजत नहीं है कि वे अपनी तस्वीरें इन पोस्टरों पर छपवाएं। अलबत्ता, अपनी ‘नेता’ का अभिवादन करते हुए वे इन पोस्टरों पर अपने नाम छपवा सकते हैं। इन पोस्टरों पर लिखे नारे यह बताते हैं कि किस तरह से ‘अम्माजी’ देश की समस्याएं दूर कर देंगी। यह जो ‘जी’ प्रत्यय अम्मा के साथ जुड़ा है, वह पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रेम की अभिव्यक्ति भर नहीं है। दरअसल, प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अपना नाम उछालने के बाद जयललिता लगातार इस पद के दूसरे दावेदारों- मोदीजी, मुलायमजी, ममताजी और अब नीतीशजी से मुकाबले के लिए अपनी रणनीति मांज रही हैं।

पिछले गुरुवार को जयललिता ने तमिलनाडु में वाम दलों के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया। प्रकाश कारात राष्ट्रीय स्तर पर जिस ‘तीसरे विकल्प’ का प्रस्ताव पेश कर रहे थे, आसमान में उड़ने से पहले ही उस वैकल्पिक गुब्बारे की हवा निकल गई। वामपंथी पार्टियों को अम्मा के विश्वासघात का अंदेशा पहले से था, क्योंकि गठबंधन की घोषणा के बाद सीटों के बंटवारे की बातचीत किसी नतीजे पर पहुंच ही नहीं पा रही थी। दरअसल, सीपीएम के एक बड़े नेता तो अम्मा से यह शिकायत करने भी पहुंच गए थे कि वह अपने भाषणों में डीएमके और कांग्रेस के खिलाफ तो तीखे तेवर अपनाती हैं, मगर मोदी या भाजपा के अन्य नेताओं के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलतीं।

इसके दो परिणाम हो सकते हैं- चुनाव के बाद के हालात में जयललिता भाजपा के साथ गठबंधन कर सकती हैं और यदि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा 200 के आंकड़े को पार करने में नाकाम रही, तो वह ‘किंगमेकर’ बन सकती हैं। एक तीसरी संभावना के द्वार को ममता ने खोल दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए जयललिता को अपना समर्थन देने की बात कही है। निस्संदेह, हर दांव का अपना गणित होता है और कई बार तो इनका दिखावे से ज्यादा कोई महत्व भी नहीं होता। ममता ने जिस तत्परता के साथ जयललिता का समर्थन किया, उसके पीछे उनका मकसद अपने चिर विरोधी यानी वाम दलों के जले पर नमक छिड़कना ही था। जाहिर है, वाम पार्टियां केंद्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए इन दिनों संघर्ष कर रही हैं।

देश में आज ऐसे क्षत्रपों की कोई कमी नहीं है, जो प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन हालत यह है कि इनमें से कोई भी 30 से 35 सीटें जीतता हुआ नहीं दिख रहा, जबकि त्रिशंकु संसद की सूरत में ये आंकड़े काफी महत्वपूर्ण साबित होंगे। इसलिए जयललिता इस जादुई संख्या को हासिल करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतीं। इस समय तमिलनाडु की सियासत त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रही है। इसमें कोई दोराय नहीं कि लगभग 28 से 30 वोट प्रतिशत वाली जयललिता की पार्टी मजबूत हैसियत में है, क्योंकि राज्य में विपक्ष में भारी उठा-पटक मची हुई है। जयललिता खुद को प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार बताकर राज्य में एक लहर पैदा करना चाहती हैं, जिस पर सवार हो वह ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब हो जाएं। यह संभव है कि राजीव गांधी हत्याकांड मामले में जयललिता द्वारा तमिल राष्ट्रवादियों का पक्ष लेने से मध्यवर्ग के कुछ लोगों को धक्का लगा हो, लेकिन अन्नाद्रमुक सुप्रीमो ने इस उम्मीद में यह कदम उठाया कि वह अपने धुर विरोधी के खेमे से तमिल मुद्दे को हड़प लेंगी और फिर मध्यवर्ग की नाराजगी की भरपायी इस नए समर्थक वर्ग के वोटों से हो जाएगी।

गौरतलब है कि एक वक्त उन्होंने राजीव हत्याकांड में उम्रकैद की सजा भुगत रही नलिनी के पेरोल तक का विरोध किया था। तमिल मुद्दे और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी ने राज्य में बहस की दिशा ही बदल दी है, बल्कि कुछ हद तक सत्ता विरोधी मुद्दों से जुड़ी बहसों या राज्य संचालन में खुद जयललिता की नाकामियों को हाशिये पर कर दिया है। शायद इसी रणनीति से प्रेरित होकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी यह दांव चला है। नीतीश कुमार ने पिछले दिनों कहा कि इस समय प्रधानमंत्री पद की दौड़ में जितने लोग शामिल हैं, उनसे कहीं अधिक योग्य उम्मीदवार तो वह खुद हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु में भाजपा के नेतृत्व वाला मोर्चा अन्नाद्रमुक का सबसे तगड़ा प्रतिद्वंद्वी बन सकता है। हालांकि, राज्य में पारंपरिक तौर पर भाजपा का कोई आधार नहीं है और पिछले चुनाव में भी उसका वोट प्रतिशत दो-चार प्रतिशत से अधिक नहीं रहा होगा, मगर पार्टी को आशा है कि ‘मोदी लहर’ उसके पक्ष में काफी बड़ा बदलाव लाएगी।

इसके समर्थकों पर भरोसा करें, तो भाजपा 10 से 12 फीसदी के बीच वोट हासिल कर सकती है। शायद यही वजह है कि छोटी पार्टियां भाजपा से गठजोड़ के लिए उसकी तरफ कदम बढ़ा रही हैं। अभिनेता विजयकांत की पार्टी डीएमडीके ने शुक्रवार से सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा से बातचीत शुरू कर दी है। करीब आठ फीसदी वोटों वाली डीएमडीके ने 14 संसदीय सीटों पर अपना दावा पेश कर रही है। उधर पांच से छह प्रतिशत वोटों पर अधिकार रखने वाली रामदौस की पार्टी पीएमके आठ सीटें मांग रही है। वाइको की एमडीएमके का भाजपा से पहले ही गठबंधन हो चुका है और उसके साथ सीटों का बंटवारा अभी बाकी है। इस तरह भाजपा के नेतृत्व वाला मोर्चा 25 से 28 प्रतिशत वोट प्रतिशत के साथ अन्नाद्रमुक के सामने चुनौती पेश कर सकता है।

ऐसा हुआ, तो द्रमुक को तीसरे स्थान पर जाना पड़ेगा। इस समय द्रमुक के साथ मात्र दो-तीन छोटे-छोटे सहयोगी दल हैं। एक पार्टी, जिससे सब ने इस बार किनारा कर लिया है, वह है कांग्रेस। लेकिन अभी ये शुरुआती दिन हैं। गठबंधनों की बातचीत तो अभी शुरू ही हुई है। करुणानिधि राजनीति के पुराने धुरंधर हैं, वह आखिरी समय में सबको चौंका सकते हैं। फिलहाल वह वाम दलों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। सीपीआई तो मान भी गई है, लेकिन 2-जी घोटाले के मसले को लेकर माकपा हिचक रही है। इसलिए तमिलनाडु में गठबंधन को लेकर फिलहाल कुछ भी कहना अल्पजीवी ही साबित होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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