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आचार संहिता इतनी संकुचित नहीं हो सकती

‘आप’ ने अपने नेता के गुजरात में हिरासत में लिए जाने के विरोध में दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। जनतंत्र में प्रदर्शन जायज माना जाता है, अगर आचार संहिता के खिलाफ भी था, तो क्या वहां जो हुआ, सही था? टेलीविजन पर जो कुछ नजर आ रहा था, उससे क्या नहीं लगता कि लोग पहले से तैयार थे, नहीं तो इतने बड़े-बड़े पत्थर, ईंटें और लाठी-डंडे एकाएक कहां से आ गए? पुलिस स्वयं देख रही थी। टीवी पर आप के नेता माफी भी मांग रहे थे। लेकिन भाजपा में माफी का उचित जवाब देने का भी माद्दा नजर नहीं आता। सद्भावना तभी बनती है, जब दोनों तरफ गुंजाइश हो। भाजपा के एक नेता टीवी पर कह रहे थे कि कोई मेरे घर में घुसे, तो मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूं? गांधी जी को एक आदमी दक्षिण अफ्रीका में छुरे से मारने आया, उन्होंने उसे देख लिया, वह उसके पास गए और गले में हाथ डालकर साथ चलते रहे, थोड़ी देर की बातचीत के बाद उसने अपनी भूल स्वीकार कर ली और छुरा छोड़ दिया। डरे हुए लोग ऐसा नहीं करते।

चुनाव आयोग को संतुलन बनाए रखने के लिए बिना इजाजत प्रदर्शन करने पर नोटिस देना चाहिए था, जो दिया भी गया। लेकिन इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि डंडे-पत्थर कैसे चले? पुलिस ने रोकने का क्या प्रयत्न किया? कोई भी आचार संहिता इतनी संकुचित तो नहीं हो सकती कि वह पुलिस और दूसरे संबंधित दल के आचरण का नोटिस न ले। लगता है कि आने वाले चुनाव में नेताओं की परस्पर घृणा और वैमनस्य का प्रदर्शन होने जा रहा है। सभी पार्टियों के  नेता एक-दूसरे के प्रति घृणा फैलाने के सिवाय दूसरा कोई और काम नहीं कर रहे हैं। चुनाव प्रचार दुर्भाग्यवश अहं और नफरत का कोरस होता जा रहा है। जाहिर है, ये घृणा और वैमनस्य नेताओं तक ही सीमित नहीं रहेंगे। जनता में भी ये जहर की तरह फैल रहे हैं, आगे ये और गाढ़ा हो सकते हैं।

आचार संहिता का उद्देश्य मात्र नियमों को लागू करना नहीं है, बल्कि चुनाव में उतरे दलों के बीच सद्भाव को बनाए रखना भी होना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कोई दल दूसरे दल को नुकसान पहुंचाने के रास्ते पर तो नहीं चल रहा। चुनाव जनतंत्र का सबसे बड़ा यज्ञ है, जिसका पुरोहित चुनाव आयोग है। उसमें भागीदार उसी भावना से भाग लें, जिस भाव से अपने घरों में होने वाले अनुष्ठान में लेते हैं। जो पार्टियां अपने को सांस्कृतिक व परंपरागत मानती हैं, उनके ऊपर यह जिम्मेदारी अधिक आयद है। परंपराएं कोशिश करने से बनती हैं। चंद्रभानु गुप्ता के मुख्यमंत्री-काल में चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ी थी और गुप्ता सरकार अल्पमत में आ गई, तो मुख्यमंत्री ने त्यागपत्र दे दिया था। वह चाहते, तो बने रह सकते थे। हाईकमान भी नाराज हुआ था। तब उन्होंने कहा था, मैं गलत मिसाल नहीं रखना चाहता। मिसाल रखने वाले लोग अब कहां हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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