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सियासी तरक्की का वक्त

अपनी बहुमंजिली इमारत के दड़बे के सामने एक पार्क है। वहां चिड़ियों की चहचहाहट इधर बढ़ी है। हमें लगता है कि मौसम से आदमी के मिजाज का ही नहीं, पंछियों के गाने-चहकने का भी ताल्लुक है। कृषि-विशेषज्ञ बताते हैं कि गेहूं, आलू, सरसों की फसलें बर्बादी के कगार पर हैं। महंगाई के मारे क्या अब पेट भरने के लाले पड़ने वाले हैं? चिड़ियों को चिंता नहीं है। वे आराम से इस डाल से उस डाल पर फुदक रही हैं। उनकी भूख मिटाने का प्रबंध प्रकृति के जिम्मे है। उनकी जेब लूटने को न सरकार है, न बिल्डर। हमें अचानक कोफ्त होती है। दूसरों के दुख में हम शाब्दिक संवेदना के नाटक के अलावा और करते ही क्या हैं? भयंकर प्राकृतिक आपदा तक में समृद्ध तभी जेब ढीली करते हैं, जब आयकर से छूट मिले। सीमित सांसों के सफर में अपनों से 36 का आंकड़ा कहां की इंसानियत है? आदमी-आदमी के बीच जाति-धर्म की दीवारें खड़ी करने की मूर्खता के बावजूद हमें अपनी बुद्धि और सर्वश्रेष्ठ होने पर नाज है। यदि कोई संपन्न है, तो कानून के शिकंजे से बच निकलने को वह वकीलों की दलीलों का नतीजा नहीं, अपनी बेगुनाही का प्रमाण मानता है।

तुलसीदास जी सही फरमा गए हैं। समरथ को सजा न तब थी, न अब है। जो जितना नैतिक मूल्यों से विलग है, वह उतना ही सफल है। कभी वह सत्ता पाता है, तो कहीं पैसा कमाता है। सफेदपोश ठग विन्रमता का मुखौटा लगाए आज हर क्षेत्र में शिखर पर हैं। किसी भी किस्म के उसूल की उम्मीद वर्तमान के जीवन मूल्यों में दकियानूसी की निशानी है। मुंह देखी बातें करना व्यवहार-पटुता का पर्याय है और उसके विपरीत कर्म, समझदारी। मूल्यहीनता के इस संकट के समय सियासी बंधु हमारे अंतर में आशा जगाते हैं। नेता का संबोधन वर्तमान में सबसे भद्दी गाली है।
प्रजातंत्र के पेड़ पर दलों की शाखें हैं। हमें खुशी है कि चुनाव काल में एक से दूसरे दल की डाल पर फुदकने में किसी को परहेज नहीं है। पार्टी के सीमित आदर्शो के इंसानी बंधन को तोड़कर उड़ान की सीमा जन-कल्याण का विस्तृत आकाश है। ऐसों की आदमी से चिड़िया तक तरक्की क्या एक प्रशंसनीय उपलब्धि नहीं है?

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