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शंकाओं के साथ

शंकाएं सदैव किसी सकारात्मक बात के लिए होती हैं। यदि कोई आपको कहता है कि मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं, तो आप तुरंत उससे क्या कहते हैं? ‘सच में?’ यदि कोई आपको कहता है कि मैं आपसे घृणा करता हूं, तब आप यह कभी नहीं पूछते, ‘क्या सच में?’ हम एक व्यक्ति की सच्चाई पर संदेह करते हैं, पर हम किसी की कपटता पर कभी संदेह नहीं करते। उसी प्रकार, आप अपनी क्षमताओं पर संदेह करते हैं, आप कभी अपनी दुर्बलता पर संदेह नहीं करते। जब आप प्रसन्न होते हैं, तो आप पूछते हैं, ‘क्या यह सच है? क्या मैं सपना देख रहा हूं?’ पर जब आप दुखी होते हैं, तो आप नहीं पूछते कि ‘क्या यह सच है?’ आप अपनी उदासीनता से इतने विश्वस्त होते हैं। हम कभी अपनी उदासीनता पर संदेह नहीं करते, इसलिए शंका हमेशा किसी सकारात्मक बात पर ही होती है। हम किसी नकारात्मक बात पर संदेह नहीं करते। एक बुद्धिमान व्यक्ति इसको घुमा देता है और नकारात्मक पर संदेह करने लगता है। यदि कोई मिलता है और आपको कहता है कि फलां आपके बारे में बुरी बातें कह रहा था, तो आप एकदम इस पर विश्वास कर लेते हैं।

ऐसा मत करिए। कहिए, ‘नहीं, मैं नहीं मानता’ और आप उस व्यक्ति को फोन करके बोलिए कि ‘कोई मुझे बता रहा है कि आपने मेरे बारे में बुरी बातें कही हैं, पर मैं विश्वास नहीं करता।’ जब आप यह कहेंगे, यदि उस व्यक्ति ने बुरी बातें कही भी हैं, तो उसका मन बदल जाएगा। जब किसी व्यक्ति का संस्थापन ठीक नहीं होता, इसका असर परिवार पर पड़ता है। ऐसे बहुत से प्रभावित परिवारों से समाज और राष्ट्र प्रभावित हो जाते हैं। ज्ञान और बुद्धि लोगों को शक्ति देते हैं और लोगों के मुस्कराने में सहायक होते हैं, चाहे कोई भी चुनौती हो। यही है जीने की कला कि कैसे मुस्कराहट को ताजा और जिंदा रखें, और समाज की सेवा करते रहें। मुस्कराइए और सेवा करिए।
श्री श्री रविशंकर

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