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प्रोटीन का प्रपंच

जब कोई फिल्मी हीरो किसी फिल्म के लिए सिक्स पैक्स बनाता है, तो अक्सर अखबारों-पत्रिकाओं में उसके इंटरव्यू छपते हैं, जिनमें वह बताता है कि उसने कैसे व्यायाम किया और क्या खाया, मसलन भुना या उबला चिकन, अंडे की सफेदी, प्रोटीन शेक, कार्बोहाइड्रेट के नाम पर एकाध फल या ब्राउन ब्रेड के दो स्लाइस वगैरह। उन दवाओं और सप्लीमेंट्स के नाम हीरो महोदय नहीं बताते, जो उन्होंने खाए, न ही अपने कैमरामैन और मेकअपमैन की सेवाओं को याद करते हैं, जिनकी वजह से उनका शरीर परदे पर किसी मूर्तिकार की रचना की तरह दिखा। लोग मानते हैं कि ऋतिक रोशन या सलमान खान की तरह बॉडी बनाने के लिए ढेर सारे प्रोटीन खाने चाहिए, फैट्स और कार्बोहाइड्रेट का यथासंभव बहिष्कार कर देना चाहिए। हमारे जमाने में सेहत के मामले में दो फैशन चले हैं, पहला यह कि ढेर सारे प्रोटीन खाने से तगड़ा शरीर बनता है, दूसरा कि वजन कम होना सेहत के लिए अच्छा है, जितना कम वजन, उतनी सेहत अच्छी।

परंपरागत वैज्ञानिक समझ यह कहती है कि रोज के खाने में लगभग 50 से 60 प्रतिशत ऊर्जा कार्बोहाइड्रेट से मिलनी चाहिए, 12 से 20 प्रतिशत प्रोटीन से और लगभग 30 प्रतिशत फैट्स से। नए जमाने में कई फैशनेबल डाइट प्लान आए और कई फिल्मी सितारों ने भी उनका प्रचार किया। डंकन डाइट, एटकिंस डाइट और पैलियो डाइट जैसे तमाम डाइट कार्बोहाइड्रेट घटाने और प्रोटीन को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, हालांकि इनकी उपयोगिता संदेहास्पद है। पिछले दिनों अमेरिका में हुए एक विस्तृत अध्ययन ने बताया कि जिन लोगों के भोजन में मांस, अंडे और दूध-पनीर जैसे पशुओं से प्राप्त हुए प्रोटीन ज्यादा होते हैं, उन्हें कैंसर होने की आशंका ज्यादा होती है। पश्चिमी भोजन में तो प्रोटीन का अर्थ ही पशुओं से प्राप्त प्रोटीन है, इसलिए इस अध्ययन का महत्व ज्यादा है। अध्ययन यह भी बताता है कि अधेड़ उम्र में ज्यादा पशु आधारित प्रोटीन खाना कैंसर ही नहीं पैदा करता, बल्कि कुल जमा सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है।

उनका कहना है कि खाने में प्रोटीन से मिलने वाली ऊर्जा 20 प्रतिशत से कम होनी चाहिए। ज्यादा प्रोटीन वाला खाना खाने वाले लोगों के खून में एक हारमोन की मात्रा बढ़ जाती है, जो कैंसर के ट्यूमर को बढ़ाता है। भारत में आमतौर पर भोजन के जो रिवाज हैं, उनमें यह खतरा कम है, क्योंकि हमारे यहां ज्यादातर मांसाहारी लोग अमूमन रोज मांसाहार नहीं करते। करते भी हैं, तो मांस या अंडे व्यापक भोजन के ही अंग होते हैं। शाकाहारी प्रोटीन से वैसे भी ज्यादा प्रोटीन का अंदेशा नहीं होता, क्योंकि दालों वगैरह में प्रोटीन उतना ज्यादा नहीं होता, जितना मांस या अंडे की सफेदी में होता है। फिर भी फिल्मी हीरो की डाइट से बचकर रहना ठीक है।

इस अध्ययन की एक और बात गौरतलब है। बड़ी उम्र के लोगों के लिए ज्यादा प्रोटीन खाना सेहत के लिए अच्छा है। यह कई और अध्ययनों से भी पता चला है कि बड़ी उम्र में वजन कुछ ज्यादा हो, तो अच्छा होता है, वजन जितना कम, सेहत उतनी अच्छी का सिद्धांत यहां काम नहीं करता। 40 की उम्र के बाद हड्डियों और मांसपेशियों का क्षरण शुरू हो जाता है। इसकी भरपायी के लिए ज्यादा प्रोटीन लेना जरूरी है, वरना शरीर कमजोर हो जाता है और रोगों से नहीं लड़ पाता। यह पाया गया है कि जिनका सामान्य से थोड़ा-सा ज्यादा वजन होता है, वे लोग ज्यादा दीर्घायु होते हैं। बहुत ज्यादा या बहुत कम वजन वालों को इसलिए सावधान हो जाना चाहिए। घुमा- फिराकर बात वहीं आ गई कि हर नए फैशन के साथ न दौड़िए, अपनी समझ का इस्तेमाल कीजिए और सब कुछ संतुलित रखिए।

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