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आप की उल्टी गिनती

लगता है कि आम आदमी पार्टी की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। पहले तो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की कुर्सी छोड़ दी, अब ऐसा लगता है कि उनके उत्साही समर्थक शिथिल पड़ने लगे। मीडिया में भी आप के लोग अब कम दिखने लगे हैं। फिर पार्टी ने जिन लोगों को मैदान में उतारा है, उनमें बेहद कम ही ईमानदार और निष्ठावान नजर आते हैं। पार्टी के एक नेता ने ही आरोप लगाया है कि सीटें बिक रही हैं। इसके बाद गुजरात में अरविंद केजरीवाल को रोका गया और दिल्ली में भाजपा और आप कार्यकर्ताओं के बीच भिडंत हो गई। इस भिडंत से भी लोग आप से निराश हुए। इन सबका असर है कि पार्टी के एक नेता के चेहरे पर कालिख पोत दी गई। हालांकि, लोकतंत्र में ऐसी घटनाओं के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि अराजकता को बढ़ावा किसने दिया? यह कहने में अब कोई संकोच नहीं है कि आम आदमी पार्टी से आम लोग त्रस्त नजर आ रहे हैं।
मीना बिष्ट, पालम, नई दिल्ली

गलत नीति का नतीजा

यदि पिछले दस साल के इतिहास को पलटें, तो आतंकी घटनाओं से मरने वालों की संख्या मुश्किल से कुछ हजार होगी, परंतु करप्ट सिस्टम से मरने वालों की तादाद कहीं ज्यादा है। यही नहीं, जो आतंकी हैं, वे हमारे तंत्र के भ्रष्टाचार और काहिली के कारण ही सफल होते हैं। यह समझने की जरूरत है कि आतंकवाद को खत्म करने से पहले हमें अपने तंत्र को सुधारना होगा। यदि तंत्र सुधर जाता है, तो आतंकवाद पर बहुत हद तक खुद ही अंकुश लग जाएगा। जितना धन आतंकवाद को मिटाने पर खर्च होता है, उससे बहुत कम धनराशि में हमारी व्यवस्था सुधर सकती है। यह भी गौर करने वाली बात है कि आतंकवाद के नाम पर देश में जमकर राजनीति होने लगी है। बेशक, यह देश के सामने एक बड़ी चुनौती है, लेकिन गरीबी, भुखमरी व बेरोजगारी कोई छोटी समस्या नहीं है। अब देखना यह है कि हम आतंकवाद के नाम पर हो रही राजनीति को समर्थन देते हैं या विकास के नाम पर हो रही सियासत को।
आमोद शास्त्री, मदनपुर खादर, दिल्ली

हादसों के पीछे का सच

नौसेना के जिस कोलकाता पोत में हादसा हुआ, उसकी गिनती दुनिया के आधुनिकतम पोतों में की जाती रही है। इससे पहले भी कुछ हादसे अलग-अलग जगहों पर हुए हैं। ऐसे में, यही लगता है कि भारतीय नौसेना अपनी सजगता और ताकत खोती जा रही है। दुर्भाग्य से थल सेना और वायु सेना भी इस समस्या से दो-चार हो रही हैं। रक्षा जरूरतों के मामले में विडंबना यह है कि एक तरफ दावा किया जाता है कि धन की कमी नहीं है, वहीं दूसरी तरफ यह देखने में आता है कि हथियार खरीदे ही नहीं जा रहे हैं और जो हथियार खरीदे भी गए हैं, वे अपेक्षित गुणवत्ता के नहीं हैं। अब नौसेना के आधुनिकीकरण के मामले को ही लें, कई पनडुब्बियों की खरीद की फाइलें अरसे से मंत्रालयों में अटकी पड़ी हैं। ऐसे में, लगता है कि जब तक हथियार खरीद के मामले में किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी। नौसेना जिस तरह से एक के बाद दूसरी दुर्घटनाओं से जूझ रही है, उसे देखते हुए हमारे नीति-नियंताओं की आंखें खुल जानी चाहिए।
सुभाष बुड़ावन वाला, शांतिनाथ, खाचरौद

सत्ता और विपक्ष

अगली लोकसभा के लिए चुनावी अखाड़ा तैयार हो चुका है। मौजूदा सरकार वापसी की कोशिश में है, तो विपक्ष सत्ता पर कब्जे का प्रयास कर रहा है। सरकार उपलब्धियों के नाम पर वोट मांग रही है, तो विपक्ष मौजूदा सरकार की खामियां गिना रहा है। फंस गए हैं बेचारे वोटर कि जाएं, तो जाएं कहां, क्योंकि अब भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं है, बल्कि मुद्दा है कि कौन जीत में कंधा देगा? आशंका इस बात की है कि कहीं नई बोतल में पुरानी शराब  न परोस दी जाए? इसलिए देश के मतदाताओं को जागरूकता दिखानी होगी और बुद्धि-विवेक के आधार पर अपने मताधिकार का निर्भीक होकर इस्तेमाल करना होगा।
शैलेंद्र सिंह, दिल्ली

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