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खुले बाजार ने बदल दिया देश

इस दौर में देश में कई निर्णायक बदलाव हुए। देश ने आपातकाल देखा। इंदिरा गांधी को पहली बार जनता का गुस्सा ङोलना पड़ा। जेपी ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया। गठबंधन की राजनीति, मंडल-कमंडल, आर्थिक उदारीकरण आदि ने राजनीति की पूरी बिसात ही बदल कर रख दी।

सम्पूर्ण क्रांति
जयप्रकाश नारायण (जेपी) को आजादी के बाद जन आंदोलन का जनक माना जाता है। जेपी ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लिया था।  उन्होंने एक बार फिर क्रांति की मशाल अपने हाथ में थामी। इस बार उनके निशाने पर अपनी ही सरकार थी। 1974 में पहली बार उन्होंने किसानों के बिहार आंदोलन में राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की। दूसरी ओर केंद्र में काबिज इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ भी उनके मन में आक्रोश पनप रहा था।
पांच जून 1974 से पहले जो हो रहा था वह प्रदर्शन भर था। पांच जून को वह जन आंदोलन में तब्दील हो गया। जेपी का प्रदर्शन छात्रों और युवाओं की कुछ तात्कालिक मांगों तक सीमित था, जिसे तत्कालीन राज्य सरकार मान लेती तो जेपी का प्रदर्शन शायद जनआंदोलन का रूप नहीं लेता, लेकिन सरकार की जिद की वजह से जेपी ने  पांच जून 1974 को संपूर्ण क्रांति का आह्वान कर दिया। पांच जून की शाम को पटना के गांधी मैदान में लगभग पांच लाख लोगों की अति उत्साही भीड़ भरी जनसभा में देश की गिरती हालत, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, दिशाहीन शिक्षा प्रणाली के विरुद्ध जेपी ने जनता से संपूर्ण क्रांति आह्वान किया।

जेपी ने सात जून 1974 से बिहार विधानसभा भंग करो अभियान चलाए और विधायकों, मंत्रियों को रोकने के लिए विधानसभा के सामने प्रदर्शन किया। इस दौरान लाठी चार्ज और गोली-बारी में दर्जनों लोग घायल हुए। इस तरह से पटना के गांधी मैदान से शुरू हुआ जन आंदोलन पूरे भारत में संपूर्ण क्रांति के रूप में बदल गया। इसी बीच 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने के कदम ने आग में घी का काम किया। इसका नतीजा यह हुआ कि 1977 में हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल हो गईं।

इंदिरा वापस लाओ
आपातकाल के बाद 1977 में छठी लोकसभा के लिए चुनाव हुआ। चुनाव में इंदिरा को पार्टी और बाहर से मिलने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के कुछ नेताओं जैसे जगजीवन राम और हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस फोर डेमोक्रेसी (सीएफडी) बनाई। विपक्ष की कई पार्टियों ने मिल कर जनता पार्टी का गठन किया। इनमें प्रमुख रूप से सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, लोकदल, स्वतंत्र पार्टी और कुछ कांग्रेस से अलग हुए नेता शामिल थे। जनता पार्टी का नेतृत्व पूर्व कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। अन्य मुख्य नेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी, चौधरी चरण सिंह, राज नारायण और जॉर्ज फर्नाडिस थे।

चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इंदिरा और संजय गांधी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। कांग्रेस को मात्र 153 सीटें मिलीं, जबकि इससे पहले के चुनाव में उसके पास 350 सीट थीं। जनता पार्टी ने मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनाई। जनता पार्टी में गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने कई आरोपों में इंदिरा और संजय गांधी को गिरफ्तार करने के आदेश दिए। गिरफ्तारी से इंदिरा के प्रति लोगों में सहानुभूति पैदा हो गई। आपसी कलह के कारण जून 1979 में मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया। इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। कुछ में ही यह सरकार भी गिर गई। दो वर्ष में दो प्रधानमंत्री देखने वाले देश में इंदिरा वापस लाओ की मुहिम शुरू हो गई। 1980 के चुनाव में कांग्रेस की वापसी स्थायित्व के मुद्दे पर हो गई। इंदिरा एक बार फिर प्रधानमंत्री बन गईं। इस दौरान संजय गांधी की मौत एक हवाई दुर्घटना में हो गई, जिससे इंदिरा को काफी झटका लगा।

मंडल-कमंडल
31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। इंदिरा की हत्या के तुरंत बाद देश में आठवें आम चुनाव हुए। इस दौरान आतंकवाद की वजह से पंजाब और असम में मतदान नहीं हुआ। राजीव के नेतृत्व में हुए इन चुनाव में कांग्रेस को 514 में से 404 सीटें मिलीं। राजीव की सरकार में वित्त और रक्षामंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह को कैबिनेट से हटा दिया गया। इसके बाद वीपी सिंह ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर जन मोर्चा बनाया। इलाहाबाद से उप चुनाव जीत लोकसभा में पहुंचे। 11 अक्तूबर 1988 को जनता दल का उदय हुआ। राजीव गांधी को टक्कर देने के लिए जनता दल ने वीपी सिंह को आगे किया और कई पार्टियों के गठबंधन से नेशनल फंट्र बना।

1989 में कांग्रेस को बहुत कम सीट मिलीं। राजीव ने विपक्ष में बैठना मंजूर किया। नेशनल फ्रंट ने भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों के बाहर से समर्थन से वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाया। वीपी सिंह ने अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) को आरक्षण देने की अनुशंसा करने वाली मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया।  इस बीच भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात में स्थिति सोमनाथ मंदिर से 20 सितंबर 1990 से अयोध्या के लिए रथ यात्रा शुरू की। रथ यात्रा को 30 अक्तूबर 1990 को अयोध्या पहुंचना था, लेकिन 23 अक्तूबर को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। मंडल-कमंडल का असर अगले कई चुनावों तक देखा गया।


अटल की सरकार
भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी का दौर 1998 में हुए आम चुनाव के बाद शुरू हुआ। हालांकि 1996 में भी वह 13 दिन तक प्रधानमंत्री रह चुके थे। दो वर्ष में देश ने तीन प्रधानमंत्री देखे। 1998 में देश एक बार फिर चुनाव के मुहाने पर पहुंच गया। 1998 में 12वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुआ। इस बार भी किसी दल या गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इस बार भी 182 सीट लेकर भाजपा सबसे बड़ा दल बना। भाजपा ने 13 अन्य दलों से गठबंधन कर एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) बनाया और प्रधानमंत्री बनें वाजपेयी। इसी दौरान भारत सरकार ने पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किए। विश्व समुदाय ने इसकी आलोचना की और अमेरिका ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। इसके बाद फरवरी 1999 में वाजपेयी ने पाकिस्तान का दौरा किया और लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कर पाक से रिश्ते सुधारने की कोशिश की।

13 महीने सरकार चलने के बाद एआईएडीएमके की जयललिता ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में विश्वासमत के दौरान अटल की सरकार मात्र एक वोट से गिर गई। 1999 में 13वीं लोकसभा के लिए सितंबर-अक्तूबर में चुनाव हुआ। इस बार एनडीए को बहुमत हासिल हुआ, लेकिन इस बार एनडीए का कुनबा 14 से बढ़कर 17 पार्टियों तक पहुंच चुका था। 13 अक्तूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। इसी साल दिसंबर में नेपाल से इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर कंधार ले जाया गया। भारतीय नागरिकों को छोड़ने के लिए आतंकियों ने मौलान मसूद अजहर कुछ आतंकवादी छोड़ने पड़े। 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत आए और अमेरिका से संबंधों में सुधार हुआ। 2001 में संसद भवन पर आतंकी हमला हुआ। इसके बाद भारत-पाक संबंधों में एक बार फिर तनाव आ गया। 2002 में साबरमती ट्रेन हादसे के बाद गुजरात में दंगे फैल गए। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी।

उदारीकरण का दौर
1991 में दसवीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए। मई में पहले चरण के 211 सीटों के लिए मतदान हुआ। दूसरे चरण के लिए प्रचार जारी था। इसी दौरान 21 मई को एक आतंकी घटना में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। राजीव की मौत के बाद दूसरे चरण के मतदान हुए। इस चुनाव में कांग्रेस को सबसे अधिक 232 सीटें मिली थीं (चुनाव हुआ 521 सीटों पर)। कांग्रेस ने पीवी नरसिंह राव को प्रधानमंत्री पद की कमान सौंपी। पीवी नरसिंह राव ने जब देश की कमान संभाली तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से डांवाडोल थी और भारत दिवालिएपन के कगार पर था। राव ने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाने का फैसला किया, जो वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री हैं।

मनमोहन सिंह ने भी राव के इस निर्णय को सही साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सिंह ने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारा, बल्कि उदारीकरण का मार्ग प्रशस्त करते हुए भारतीय बाजार को खोल दिया। इसी वजह से मनमोहन सिंह को भारत में आर्थिक उदारीकरण का जनक भी माना जाता है। वित्तमंत्री बनने से पहले मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके थे। 1996 में नरसिंह राव के सत्ता से जाते-जाते भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई थी, जो अब भी उसी राह पर दौड़ रही है।



गठबंधन की राजनीति परिपक्व हुई: मारवाह
छठे से लेकर 13वें लोकसभा चुनाव तक का समय भारतीय लोकतंत्र का परिवर्तन काल रहा। इस बीच, कई बड़े और सार्थक बदलाव हुए, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकतर परिवर्तन अपने आप में पूर्ण साबित नहीं हुए और इनका प्रभाव मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर दिखता है। पूर्व राज्यपाल व पूर्व प्रशासनिक अधिकारी वेद मारवाह से प्रवीण प्रभाकर की बातचीत:

आपातकाल के बाद की इंदिरा से लेकर अटल सरकार तक, भारतीय राजनीति को आप कैसे आंकते हैं?
यह पूरा दौर परिवर्तनों और समीकरणों के नाम रहा। सबसे पहली चीज जो देखने को मिली वह यह कि तथाकथित वंशवादी राजनीति का क्षय होने लगा था। आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी सशक्त नेता के तौर पर ढलान की ओर बढ़ गईं। बड़ी उम्मीदों के साथ राजीव गांधी आए, लेकिन 84 दंगे, भोपाल गैस त्रासदी, शाह बानो केस और श्रीलंकाई तमिल जैसे मसलों से उनकी चमक फीकी पड़ी। इससे जो राजनीतिक शून्य उपजा, उसकी भरपाई के लिए कई दावेदार सामने आए। ये अपने साथ कई नए समीकरण ले आए। इन समीकरणों ने, यानी गठबंधन राजनीति, मंडल-कमंडल, आर्थिक उदारीकरण और क्षेत्र की राजनीति ने सत्ता की चाबी वास्तव में जनता को सौंप दी। जरा वर्तमान माहौल को देखिए- एक आम शहरी वोटर यह सोचता है कि वह सरकार बदल सकता है।

दूसरी बड़ी चीज यह हुई कि उस दौरान जो कैडर आधारित राजनीति थी, वह पहले तो मजबूत होती दिखी, फिर कमजोर पड़ने लगी। उदारीकरण के समय तक तो खत्म ही हो गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था से हम प्रभावित होने लगे थे और ट्रेड यूनियन का अस्तित्व लगभग खत्म हो गया था। इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़े, लेकिन सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि विकास के मामले में हम दुनिया से प्रतिस्पर्धा करने लगे थे। उदारीकरण से पहले जाएं, तो राजीव गांधी ने सूचना-प्रौद्योगिकी युग में प्रवेश दिला कर हमें कई देशों से आगे कर दिया। मैं मानता हूं कि पहला उदारीकरण उन्हीं के समय में हुआ था। इसी तरह जनसंघ के स्वयंसेवी कार्यकर्ता हिंदुत्व के मुद्दे पर एकजुट हुए। एकबारगी ऐसा लगा कि भारत हिंदुत्व के युग में प्रवेश कर गया है, लेकिन गठबंधन की राजनीति ने इसे रोकने में सफलता पाई और अब यह मुद्दा बड़ा नहीं, बल्कि छोटा होता जा रहा है।

तीसरी चीज, गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ, जिससे देश के सामने कई बार राजनीतिक अस्थिरता की नौबत भी आई। 1977 के चुनाव के समय मोरारजी देसाई, फिर चौधरी चरण सिंह, उसके बाद 1989 में वीपी सिंह, फिर चंद्रशेखर, इसके बाद 1991 में नरसिंह राव का अल्पमत सरकार और बाद में 1996 में अटल जी की 13 दिन की सरकार और बाद में राजग के जरिये उनका शासन, लेकिन हम यह भी कह सकते हैं कि इस दौर ने हमें सीख दी कि गठबंधन की राजनीति को परिपक्व होना होगा। 1998 के चुनाव के बाद अटल जी के नेतृत्व में राजग सरकार बनी। चौथी चीज, जनता में राजनीतिक चेतना आई। बेशक, दो बार इंदिरा  और राजीव गांधी की हत्या के बाद संवेदनाओं के आधार पर मतदान हुए, लेकिन लोग मुद्दों, अधिकारों और मांगों को लेकर जागरूक होने लगे थे।

क्या यह माना जाए कि मंडल और कमंडल की राजनीति ने भारत में जाति तथा धर्म आधारित मतदान को बढ़ावा दिया?
देखिए कमंडल का मुद्दा पहले भी था। जहां एक तरफ वंशवाद का आरोप लगता था, तो दूसरी तरफ जनसंघ के पास हिंदुत्व का मुद्दा था, लेकिन इसका प्रभाव सीमित था, क्योंकि जनता पर नेहरू-गांधी और स्वतंत्रता का प्रभाव व्यापक था। जब वीपी सिंह की सरकार आई, तो मंडल बनाम कमंडल की राजनीति जोर पकड़ने लगी। भाजपा के राम मंदिर प्रभाव को कम करने के लिए वीपी सिंह ने अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को मानने का फैसला किया। इसका प्रभाव कम करने के लिए भाजपा ने कमंडल का मुद्दा उठाया, जो तब तो नहीं, लेकिन आगे चल कर सफल हुआ। मंडल की राजनीति ने अन्य पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया और कमंडल की राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को दो धड़ों में बांटा- पहला धर्मनिरपेक्षता और दूसरा सांप्रदायिकता की राजनीति में।

इस दौर में तीन बड़े सशक्त नेता- राजीव गांधी, नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी- उभरे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। भारतीय राजनीति में आप तीनों को कैसे देखते हैं?
राजीव गांधी सीधे-सरल इंसान थे। उन्हें विरासत में सत्ता मिली। सहानुभूति वोट का फायदा मिला। उन्होंने सत्ता में रह कर कई पावर ब्रेक किए। कई बड़े मुद्दे सुलझाए। विज्ञान और सूचना-प्रौद्योगिकी में भारत को रास्ता दिखाया, लेकिन जिस बड़े प्रभाव के साथ वह आए थे, वह सिकुड़ता गया। नरसिंह राव को भी राजीव की हत्या के सहानुभूति वोट मिले। वह इंटेलक्चुअल लीडर थे। बाजार को खोलने में उनकी बड़ी भूमिका थी। अपनी दूरदृष्टि के बावजूद, राजनीति की बारीकियों और अल्पमत सरकार की मजबूरियों में वह उलझते गए। गठबंधन राजनीति वाजपेयी ने भी की, मगर इसका फायदा उठा कर उन्होंने भाजपा को नई छवि दी। उनके व्यक्तित्व ने भाजपा को कमंडल के दौर से बाहर निकाला और वह ‘सर्वमान्य’ बनी। पोखरण परमाणु परीक्षण जैसे बड़े कदम उन्होंने उठाए, लेकिन अंदरूनी कलह, गठबंधन की मजबूरियां और इंडिया शाइनिंग जैसे फैक्टर से वह भी नहीं बच पाए।

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