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हाँ, इस तरह बिकते गए थाने

एक आईपीएस हैंोसवीर सिंह। थाने बिकने नहीं देते। गैरकानूनी काम होने नहीं देते। बेाा सिफारिश मानते नहीं। नतीातन 16 साल के कॅरियर में अब तक गााीपुर में एक दिन, महाराागां में 16 दिन, ललितपुर में 25 दिन, मुाफ्फरनगर में 35 दिन और प्रतापगढ़ में पाँच महीने की कप्तानी मिली। बाकी नौकरी फूड सेल, पीएसी और पुलिस ट्रेनिंग ौसे पुलिस संगठनों में की। इस दौरान इन्हें 21 रिट, 16 विभागीयोाँच, तीन निलम्बन, एक बार बर्खास्तगी और तीन महीने की ोल ौसी साा देने के प्रयासोरूर होते रहे।ड्ढr यह संदर्भ इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि हाल में मुख्यमंत्री मायावती ने ..थाने बिकते हैं..का प्रसंग छेड़कर पुलिस सुधार की पुरानी बहस को नए तेवर दे दिए हैं। लोगों को उम्मीद बंधी है कि शायद पुलिस का चेहरा कुछ बदले। थानेदार से लेकर डीाीपी तक हर पुलिस अधिकारी को उनकी बात किसी न किसी रूप में चुभी है लेकिन सभी मानते हैं कि बात सच है।ड्ढr ‘हिन्दुस्तान’ ने इस बार में कई मौाूदा और कई रिटायर आईपीएस अधिकारियों से बात की। डीआईाी स्तर के एक आईपीएस ने माना कि थाने बिक रहे हैं और तकरीबन हरोिले में बिकते हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस सेवा में आने के बादोब उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई तो थाने के मुंशियों से पता चला कि कुछ बंधी-बंधाई आमदनी थानों में आती है। यह पैसा शराबखानों व ऐसे ही कुछ दूसर धंधों का होता है। यह पैसा थानाध्यक्ष नहीं बल्कि हेड मोहर्रिर के पासोाता था। इसका इस्तेमाल कल्याण के कामों में होता था। मसलन किसी सिपाही की बेटी की शादी में या किसी औरोरूरत को पूरा करने के लिए। कभी डीएम, एसपी या एसडीएम थाने पर आ गए तो उनके नाश्ते आदि का खर्चा भी इसी हफ्ते से निकलता था।ड्ढr फिर एसपी की तैनाती के लिएड्ढr चलने लगा पैसा : पेा 10

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