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मोबाइल के दुष्प्रभावों का होगा अध्ययन

आज की जीवनशैली में मोबाइल फोन अनिवार्य चीज बन गई है। लेकिन इससे लंबे समय तक बातें करने वालों को सावधान रहने की जरूरत है। डाक्टरों को संदेह है कि मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से डिप्रैशन, नींद में खलल, ट्यूमर और कैंसर का जोखिम बढ़ता है। इसके लिए मोबाइल फोन से निकलनेवाले रैडिएशन को जिम्मेदार ठहराया जाता है हालांकि अभी तक इस तरह के संदेहों के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय अब मानव स्वास्थ्य पर मोबाइल फोन के रडिएशन के प्रभाव को नापने के लिए शोध कराने जा रहा है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान और एम्स के बायो कैमिस्ट्री विभाग मिलकर चार हाार लोगों पर अध्ययन करंगे। मोबाइल फोन के रैडिएशन का अध्ययन महिलाओं के मासिक स्रव, हारमोन में परिवर्तन तथा पुरुष प्रजनन प्रणाली पर पड़ने वाले असर को जांचने के लिए भी किया जाएगा। इस बात का भी विश्लेषण किया जाएगा कि क्या भारत में रैडिएशन की तंरगों के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाता है। मानव स्वास्थ्य पर मोबाइल फोन के असर के बार में अनेक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन किए गए हैं। इसी साल फिनलैन्ड के वैज्ञानिकों ने उाागर किया कि मोबाइल फोन मानव त्वचा की प्रोटीन संरचना में परिवर्तन कर सकते हैं, यद्यपि स्वास्थ्य पर इसके असर के बार में कोई खास बात नहीं कही गई। इसी तरह पर्यावरण से जुड़ी एक पत्रिका में स्वीडन के वैज्ञानिकों ने उाागर किया कि 10 साल तक रोाना एक घंटा मोबाइल फोन का इस्तेमाल कैंसर जसी बीमारी की जोखिम पालने के लिए काफी है। इसके अलावा भी हाल के वर्षो में किए गए स्वतंत्र अध्ययनों में कहा गया कि मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से स्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न होता है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का निष्कर्ष है कि मोबाइल फोन के रडिएशन से स्वास्थ्य संबंधी चंद जोखिम रहते हैं।ं

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