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मासूमियत से उड़ा लेते हैं मोबाइल

लहरदार गाने सुनाकर आपको ऑन लाइन करने वाले मोबाइल फोन राजधानी के बच्चों को अपराधी बना रहे हैं। राजधानी के दोनों जुवेनाइल अदालतों में जो बाल अपराधी लाए जा रहे हैं, उनमें मोबाइल फोन की चोरी करने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। इनमें से कुछ बच्चे संगठित गिरोहों के लिए यह काम करते पाए गए तो कुछ ‘अपने बूते’ मोबाइल चोरी में कूद पड़े। राजधानी में बाल अपराधियों को सुधारने, न्याय दिलाने और उनके पुनर्वास की व्यवस्था को सहा व अधिक प्रभावी बनाने के लिए अमेरिकी व्यवस्था का अध्ययन करने वाले जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सदस्य डॉ. आलोक मिश्रा ने बताया कि दिल्ली में मोबाइल फोन जसी छोटी चोरी करने वाले बच्चे ही ज्यादातर बाल अपराधी बन रहे हैं। यहां रो औसतन 50 बच्चों की बाल अपराधी के रूप में लिस्टिंग की जाती है। जानी-मानी पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी किरण बेदी कहती हैं कि इस प्रवृत्ति की दो प्रमुख वजहें दिखाई पड़ती हैं। पहली तो यह कि मोबाइल बच्चों को आकर्षित करते हैं और दूसरी यह कि फोन आसानी से बिक जाते हैं। आमतौर पर इसकी रिपोर्ट भी दर्ज नहीं होती इसलिए यह अपराध ज्यादा आसान हो गया है। हालांकि अमन बिरादरी के नाम से बाल विकास संस्था चलाने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर एक अलग नजरिया पेश करते हैं। वह कहते हैं, ‘दरअसल मलीन बस्तियों के बच्चे ज्यादा साहसी होते हैं और कम उम्र में अपने पैरों पर खड़े होने का माद्दा बटोर लेते हैं। इनमें से इक्का-दुक्का ही अपराध की ओर जाते हैं। अगर प्रतिशत के हिसाब से देखेंे तो अन्य तबकों के भी इतने फीसदी बच्चों में चोरी की लत होती है।’ बच्चे मोबाइल चोर बनते हैं तो इसके पीछे कुछ सामाजिक और आर्थिक वजहें भी हैं। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक, अच्छी और उपयोगी शिक्षा के आभाव में बच्चे अपराध की ओर जाते हैं और उपभोक्तावाद उन्हें प्रेरणा देता है।

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