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जब चुनावी दंगल में राजा पड़े अटल पर भारी

मथुरा। निज संवाददाता।  राजनीति के रंग बड़े निराले हैं। सन 1957 का चुनाव भारतीय राजनीति के पुरोधा और प्रधानमंत्री रहे भाजपा के शीर्ष नेता अटलबिहारी वाजपेयी को करारी हार का मुंह दिखाने वाला साबित हुआ था। प्रतिष्ठापूर्ण उस चुनाव को राजा महेन्द्र प्रताप को जनता ने जिताकर संसद भेजा था जबकि खांटी किसान नेता दिगम्बर सिंह कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में हार गये थे।

देश के पहले लोकसभा चुनाव 1952 में शुरू हुई देश में कांग्रेस की लहर 1957 के चुनाव तक कान्हा की नगरी में बेअसर हो गई थी। कांग्रेस ने इस चुनाव में किसानों की राजनीति में खास भूमिका निभाने वाले चौ. दिगम्बर सिंह को टिकट देकर मैदान में उतारा था। जबकि भारतीय जन संघ की टिकट पर अटलबिहारी वाजपेयी ने ताल ठोंकी। वहीं पहला चुनाव हारने के बाद भी राजा महेन्द्रप्रताप को ब्रज की जनता पर पूरा भरोसा था। जनता ने उनका भरोसा बरकरार रखते हुए दलगत राजनीति को दरकिनार कर निर्दलीय लड़े राजा महेन्द्र प्रताप को 95202 वोट देकर जिताकर संसद भेजा।

वहीं दूसरी ओर तमाम कोशशिों के बाद भी कांग्रेस अपनी लहर यहां इस चुनाव में चलाने में सफल नहीं हो सकी। जनता ने कांग्रेस को नकार दिया और उसके उम्मीदवार दिगम्बार सिंह को 69909 वोट देकर दूसरे स्थान पर रखा। इस चुनाव में जन बीजेएस यानी भारतीय जन संघ की स्थिति बेहद निराशा जनक रही। बीजेएस की टिकट पर मैदान में उतरे अटलबिहारी वाजपेयी यहां चौथे पायदान पर रहे थे। उन्हें 23620 वोट ही मिले थे। जबकि तीसरे नम्बर पर रहे निर्दलीय फौरन को 29177 वोट मिले।

इनके अलावा दो और उम्मीदवार निर्दलीय चुनाव में उतरे थे। वहीं दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री रहे और भाजपा के शीर्ष नेता अटलबिहारी वाजपेयी के राजनीतिक सफर में मथुरा सीट का 1957 का लोकसभा चुनाव शामिल है।

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