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चुनाव आयुक्त के लिए यह मौका एक बार ही आता है

कुल 81 करोड़, 40 लाख पंजीकृत मतदाता मिलकर 16वें लोकसभा चुनाव के जरिये 543 जन-प्रतिनिधियों को चुनने को तैयार हैं। यह पूरी प्रक्रिया बहुत बड़ी है, क्योंकि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त वीरवल्ली सुंदरम संपत इस पूरे आयोजन को अंजाम दे रहे हैं। चुनाव आयोग की चुनौतियों व समस्याओं पर उनसे अनुजा और उत्पल भास्कर ने बातचीत की। बातचीत के अंश-

सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत के समय क्या महसूस कर रहे हैं?
आयोग के लिए कोई भी चुनाव महत्वपूर्ण होता है। भले ही हम कर्नाटक, गुजरात, छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश के लिए चुनाव आयोजित कर रहे हों, लेकिन हर चुनाव हमारे लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। हां, यह जरूर है कि आम चुनाव कराने का अवसर किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त की पूरी जिंदगी में एक बार ही आता है।

सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
देश में 81.4 करोड़ वोटर हैं। हमें लगातार सक्रिय रहना होगा, ताकि हम शिकायतें दूर कर सकें। ऐसी शिकायत, जैसे कि कहीं किसी के पास मतदाता फोटो पहचान पत्र हो, फिर भी वह वोट नहीं डाल सकता, वगैरह-वगैरह। भले ही किसी शहर में उनकी संख्या कुछ हजार या कुछ सौ हों, लेकिन इससे असंतोष का माहौल बनता है। यह एक गंभीर मसला है। हम इससे कैसे निपटते हैं? हमने क्या किया है? यह सब विभिन्न स्तरों से लोगों तक पहुंचने पर निर्भर करता है। हमारे जिला चुनाव अधिकारियों ने लगातार कहा है कि हम सक्रिय हैं, और किसी भी समय कोई  वेबसाइट पर जाकर जानकारी ले सकता है।

सोशल मीडिया को लेकर चुनाव आयोग का क्या रवैया है?
सोशल मीडिया के इस्तेमाल के मामले में हम माहिर नहीं हैं। हमें खर्च के दृष्टिकोण से सोशल मीडिया पर नजर रखनी है। जब राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती हैं, तो अन्य चीजों के अलावा, अपने नामांकन के साथ उन्हें अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स के बारे में बताना है और यह भी बताना है कि इन पर कितने खर्च हुए। ऐसी शिकायतें आती हैं कि लोग अपने विपक्षियों को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, खासकर आखिरी 48 घंटे में वे ऐसा करते हैं। हम सोशल मीडिया एजेंसियों से बात कर रहे हैं। 

उनसे क्या बात कर रहे हैं?
उनके पास शिकायत सुनने का एक तंत्र होता है। हमारी समस्या काफी हद तक आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ी है। सोशल मीडिया का बर्ताव सबके साथ समान है, इसलिए कोई भी व्यक्ति, जिसके पास शिकायत है, वह शिकायत अधिकारी के पास जा सकता है। उनके पास किसी को विशेष दर्जा देने का तंत्र नहीं है। इसके अलावा, सोशल मीडिया के सभी सर्वर देश के बाहर हैं।

चुनाव आयोग सोशल मीडिया के इस्तेमाल में दक्ष क्यों नहीं है?
चुनाव आयोग एक जिम्मेदार संगठन है। अगर किसी को कुछ कहना है, तो हमें जवाब के लिए तैयार रहना चाहिए। जहां शिकायत है, उसे हमें दूर करना चाहिए। सोशल मीडिया ही वह इकलौता तरीका नहीं, जिससे लोग हम तक पहुंच सकते हैं और शिकायत कर सकते हैं।.. हम एक संस्था हैं, व्यक्ति नहीं और हमसे संस्था के तौर पर सवाल किया जाएगा। इसलिए हम संपर्क के परंपरागत माध्यमों और शिकायत तंत्रों के जरिये काम कर रहे हैं।

दिल्ली में चुनाव के दौरान कैमरे लगे थे। कोई भी ऑनलाइन देख सकता था। क्या आम चुनाव में ऐसा होगा?
दिल्ली का मामला अलग था। सभी जगह ऐसा करना नामुमकिन है। आप सेलफोन लेकर रांची के पोलिंग बूथ पर जाएं और फिर छत्तीसगढ़ जाएं। आप देखेंगे कि हर स्थान अपने आप में अलग है। जो दिल्ली में काम हो रहा होगा, वही काम तिरुवल्लुर में नहीं हो सकता। लेकिन सभी जगह इंटरनेट हैं। लोग ऑनलाइन जाकर अपना पोलिंग स्टेशन नंबर देख सकते हैं। इन चुनावों में एसएमएस आधारित पूछताछ है। यदि आपके पास मतदाताफोटो पहचान पत्र है, तो इसके जरिये पोलिंग स्टेशन नंबर का पता चल जाएगा। हमने यह भी कहा है कि नौ मार्च तक सब देख लें कि उनका नाम है या नहीं। नोटिफिकेशन के बाद लिस्ट से कोई भी नाम हटाया नहीं जाएगा।

ओपिनियन पोल को लेकर सैंपल साइज के संदर्भ में क्या आपने किसी मानक को अपनाने का सुझाव दिया है?

हम ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं। जो उस विषय के जानकार हैं, उनसे हमने ऐसा करने को कहा है। सैंपल साइज को लेकर एक निश्चित न्यूनतम मानक होना चाहिए। न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्डस अथॉरिटी (एनबीएसए) ने कुछ दिशा-निर्देश दिए हैं। इसने कहा है कि जब इसका प्रसारण होता है, तब यह जरूर बताया जाना चाहिए कि सैंपल साइज क्या है और किस एजेंसी ने इसे कराया है। इससे आपको उसके हितों का पता चल जाएगा और अगर यह कारोबारी घराना है, तो आप उनके हित जान जाएंगे। क्या प्रक्रिया अपनाई गई और किस पैरामीटर से इस नतीजे पर पहुंचे तथा इसमें गलती की कितनी गुंजाइश है, यह सब साफ होना जरूरी है।

चुनाव-खर्च की सीमा बढ़ाने के पीछे क्या सोच है?
कुछ लोगों ने कहा कि वास्तविक जरूरत के हिसाब से 40 लाख रुपये कम और अवास्तविक हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि 70 लाख रुपये में सब मैनेज हो जाएगा। इस सीमा को लांघने के मामले भी कम आएंगे।

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