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कवि का उपनयन संस्कार

गोष्ठी में एक युवा ‘कवि’ का उपनयन संस्कार हो रहा है-
-यह काव्य संग्रह कविता का पुनर्वास करता है। यह संग्रह कविता को हमें सुरक्षित लौटाता है। अब हमें कविता की चिंता करने की जरूरत नहीं, जब ऐसा समर्थ कवि हो, तो कविता का भविष्य उज्जवल ही होगा।
-इस कविता संग्रह का कवि बहुत आगे की सोचता है। उसकी कविता वर्तमान में खड़े होकर भविष्य की ओर निहारती है।
-इतनी ताजी कविताएं तो एक साथ किसी ने नहीं दी हैं।
इसने पहली कविता से ही अपनी जगह बना ली थी, अब पूरा संग्रह लेकर आया है। एक शिकायत है कि संग्रह इतने विलंब से क्यों आया? पहले आया होता, तो कई कवि कवि न हुए होते। यह सब पर भारी पड़ता।
-हम मोहन सिंह प्लेस में पहली बार मिले थे। तभी समझ गया था कि इस युवा में अलग तरह की बेचैनी है, वह लोर्का का जिक्र इस तरह से करता था , जैसे वह अजीज दोस्त हों। उसे ब्रेख्त की तमाम कविताएं याद थीं। नेरूदा का अद्भुत अनुवाद कर चुका था। वैसे, अनुवाद तो पहले भी हुए हैं, लेकिन इसने जैसा किया, वैसा कोई न कर सका। ऐसा लगता है कि हम नेरूदा के पास बैठकर उनकी कविता को उन्हीं की तरह पढ़ रहे हों।
-आज जब बड़े-बड़े कवि सत्ता की गोद में बैठ गए हों, तब यह कवि ही आशा की लौ जगाता है। वह कविता के विपक्ष को एक बार फिर जिंदा करता है। इस दिल्ली में तो बहुत से कवि रहते हैं, लेकिन जैसा संघर्ष इस कवि ने किया है, वैसा किसी ने नहीं किया। इसीलिए इसकी कविता में एक नई तड़प है। एक नई आंच है। नई तरह की शक्ति है। ऊर्जा है। यह इतने संघर्षों के बाद भी टूटा नहीं, बल्कि अटूट भविष्यवादी है। इसकी कुछ कविताएं इस समय विश्व के किसी भी कवि से मुकाबला करने में समर्थ हैं। इनकी कविताएं फ्रेंच में अनूदित हो रही हैं। यह काम मैं और कवि मिलकर कर रहे हैं। यह संकलन वहां की एक यूनिवर्सिटी के कोर्स में लगने वाला है। एक बात और कह दूं कि बाहर के लोग हमारे नए से नए कवि को पढ़ाने को आतुर रहते हैं और एक हम हैं कि इस जैसे नए कवियों को अपने पाठ्यक्रमों में घुसने तक नहीं देते। इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।

-आठ-दस बरस पहले, एक सुबह मेरे घर की घंटी अचानक बजी। दरवाजा खोला, तो देखा कि कोई नौजवान है, जो मिलने आया है। उसके पास एक झोला था, झोले में डायरी थी, पैरों में चप्पल थी और चेहरे पर एक मुस्कान थी। पूछा, तो बताया कि वह चंपारण का रहने वाला है और अब दिल्ली आ गया है। कंपटीशन की तैयारी कर रहा है, लेकिन कविता का बहुत शौक है। अब तक तीन-चार डायरी भर चुका है और आज तय किया कि मिलकर ही जाएगा और चाहता है कि मैं उसकी कविता एक बार देख लूं। मुझे अचानक अपने शुरुआती दिन याद आने लगे, जब मैं भी कभी, वे शायद साठ के दशक के दिन रहे होंगे, जब मैं भी एक सुबह इसी तरह आया था और जैनेंद्र के घर सुबह-सुबह पहुंचा था। मेरी कामना थी कि जैनेंद्र के दर्शन भर हो जाएं, तो समझूं कि साहित्य में आ गया। जिस तरह से जैनेंद्र उस सुबह सहज भाव से मुझसे मिले, उसी तरह मैं इस युवक से मिला, जो आज अपने एक बेहद मजबूत काव्य-संग्रह के साथ हम सबके बीच खड़ा है। मैंने इसकी कविताएं देखी मात्र हैं। इससे ज्यादा इस युवा के कवि बनने में मेरा कोई योगदान नहीं है। इसने भूमिका में व्यर्थ ही मेरा नाम गिनाया है। ऐसा न किया होता, तो मैं कुछ देर और बोलता, लेकिन फिलहाल इतना ही। कवि के उपनयन संस्कार में बीस हजार रुपये की लागत आई।

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  • Web Title:कवि का उपनयन संस्कार